जिन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता नहीं वो गृह मंत्री से इस्तीफा मांगे
By Gautam Kumar 2 फरवरी को न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार निधि सुरेश को सिंघु बॉर्डर के किसान आंदोलन स्थल पर यह कहते हुए जाने से रोका गया कि केवल “राष्ट्रीय मीडिया अधिकृत प्रेस कार्ड” वाले लोग ही जा सकते हैं। किसी भी सरकारी या…
‘जल ही जीवन है’ से ‘जितना जल उतना ही जीवन’ तक
By Malay Nirav “जल ही जीवन है” को बदलकर अब “जितना जल उतना ही जीवन” हो जाना चाहिए। एक समय था, शायद यह समय आपके जीवन में भी आया होगा, जब प्यास लगती थी, हाथ को ही ग्लास बना नलकूप से पानी पी लेता था। कोई डर नहीं था, पीने से पहले…
अनब्याही माँ : कलंक या कर्तव्य
By Pooja Kumari “जब कभी हम सुनते हैं कि पैदा करने वाली माँ ने बच्चे को कूड़े के ढेर या कहीं फेंक दी, हमारे भीतर की मानवीयता जाग उठती है, उस बच्चे के साथ रिश्ता जोड़ तड़प उठते हैं और कहते है कि ‘हाय, कैसी माँ होगी जो उस मासूम को छोड़…
दक्षिणपंथी राजनीति में कितना राष्ट्रवाद ?
By Malay Nirav राष्ट्रवाद नहीं, भ्रमवाद! वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का उभार देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इन्हें राष्ट्रवादी भावना का पोषक मानते हैं। हो सकता है, इनमें से कुछ सच में राष्ट्रवादी विचारधारा से इत्तेफ़ाक़…
मौलिक अधिकार और हमारी प्राइवेसी (भाग 2): आखिर क्या चाहता है वाट्सऐप!
By Malay Nirav & Pooja Kumari दिनों दिन के अनुभव बता रहें हैं कि हमारी सरकार और स्मार्टफ़ोन लकड़ी में पाए जाने वाले दीमक की तरह हमारी निजता को धीरे-धीरे खाए जा रहे हैं। सड़क पर रहने वाले लोगों की निजता, घरों में बंद रहने वाले लोगों से ज्यादा…
मौलिक अधिकार और हमारी प्राइवेसी (भाग 1): वाट्सऐप को हमारी निजता का कितना ख्याल!
By Malay Nirav & Pooja Kumari आपकी निजता का न होना ही आधुनिक होना है! आज कल यह सवाल गौण होता जा रहा है कि क्या ईश्वर होते हैं ? आज प्रमुख प्रश्न यह है कि आपकी निजता आपकी है या वह सार्वजनिक हो चुकी है। निजता कोरी कल्पना है या वास्तविकता, अब यह…
कृषि कानूनों पर सुनवाई: सवाल सिर्फ़ निष्पक्षता का नहीं, पितृसत्ता और इस्लामोफ़ोबिया का भी है!
By Gautam Kumar कृषि कानूनों से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को समझने से पहले हमें यह भी जान लेना चाहिए कि न्यायालय में किस मामले की सुनवाई हुई। तीन तरह के लोगों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है। पहले वो जो इन कृषि कानूनों के समर्थक हैं, दूसरे वो जो…
किसान, जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है!
By Prabhakar ” शायद किसानों को ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है इसलिए आज वो सड़कों पर हैं। किसान अपने हक की लड़ाई के लिए ही सड़कों पर आते हैं वरना उन्हें खेती किसानी से कहाँ फुरसत कि आकर कड़ी ठंड में अपनी जान गवाएँ। “ Photo credit: Reuters…
मानवता की कहानी
By Malay Nirav हम, तथाकथित सभ्य और श्रेष्ठ इन्सान, पंछी की तरह खुले आसमान में मुक्त उड़ना चाहते हैं लेकिन क्या हम इन पक्षियों की तरह मरना चाहेंगे? आप सोच रहे होंगे कि मैं यह बेतुका-सा सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ? शायद आप जानते हों या न भी जानते हों…
The nationalistic claim of the World’s Largest Vaccination Program is going to take us nowhere
By Gautam Kumar “The Prime Minister claiming the world’s largest vaccination program is set to start and the DCGI claiming that the vaccines are 110% safe, is nothing but a nationalistic claim to cover the opaque system of governance in our…