जिन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता नहीं वो गृह मंत्री से इस्तीफा मांगे
By Gautam Kumar
2 फरवरी को न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार निधि सुरेश को सिंघु बॉर्डर के किसान आंदोलन स्थल पर यह कहते हुए जाने से रोका गया कि केवल “राष्ट्रीय मीडिया अधिकृत प्रेस कार्ड” वाले लोग ही जा सकते हैं। किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी वेबसाइट पर मुझे “राष्ट्रीय मीडिया अधिकृत प्रेस कार्ड” जारी करने वाली किसी भी एजेंसी / संगठन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिल सकी है। अगर आपको यह मिल जाए, तो कृपया बताएँ।
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| Photo Credit: CNN |
इसके 2 दिन पहले की हीं बात है,सिंघु बॉर्डर के किसान आंदोलन स्थल पर हीं रिपोर्टिंग करते हुए दो पत्रकार, मनदीप पूनिया और धर्मेंद्र सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। धर्मेंद्र को मध्य रात्रि में छोड़ दिया गया जबकि मनदीप को दो दिन पुलिस हिरासत में बिताने पड़े। 2 फरवरी को दिल्ली की एक अदालत ने पत्रकार मनदीप पुनिया को जमानत दे दी। अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि कथित हाथापाई (मनदीप पुनिया को भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353 और 332 के तहत अपराध के लिए आरोपित किया गया था) की घटना शाम लगभग 6.30 बजे की है और एफ.आई.आर अगले दिन लगभग 1.21 बजे दर्ज की गई। साथ ही साथ यह भी कहा- “यह कानून का कानूनी सिद्धांत है कि जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है।” (पूरी खबर)
यह स्पष्ट था कि यदि पुलिस निधि सुरेश या किसी अन्य पत्रकार को गिरफ्तार करती तो उन्हें भी छोड़ना पड़ता। ऐसे में अगर गंभीर सवाल खड़े करने वाले पत्रकारों को आंदोलन स्थल से रिपोर्टिंग करने से रोकना है तो कोई रचनात्मक पहल करनी होगी। निधि के साथ जो हुआ शायद उसी पहल का नतीजा है।
यदि पत्रकार मनदीप पूनिया और धर्मेंद्र सिंह को किसान आंदोलन स्थल से गिरफ्तार कर लेना आपके मन में सवाल नहीं पैदा करता या जिस तरह से न्यूज़लॉन्ड्री से जुड़ी पत्रकार निधि सुरेश को किसान आंदोलन स्थल जाने से रोका गया, वह तरीका आपको ना-जायज़ नहीं लगता तो कौन गलत है यह जानने और समझने के लिए शायद इन वारदातों में कोई नया आयाम ढूँढना होगा। मगर क्या?
दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है। जाहिर है किसी विशेष पहचान पत्र वाले पत्रकारों को ही आंदोलन स्थल पर जाने की अनुमति देने वाला आदेश गृह मंत्रालय से ही आया होगा। भारत के गृह मंत्री अमित शाह हैं। मगर एक पुलिसकर्मी ने ऑफ दी रिकॉर्ड ऐसे किसी भी आधिकारिक आदेश के होने से इनकार किया। इसका मतलब गृह मंत्रालय से कोई आदेश नहीं आया। क्या ऐसे फैसले पुलिस ख़ुद ले सकती है? न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वकील गौतम भाटिया बताते हैं – “यदि पुलिस बिना किसी लिखित कानूनी आदेश के ऐसा कर रही है, तो यह पुलिस प्राधिकरण की स्पष्ट अनदेखी है।”
यह वीडियो ध्यान से देखें –
अब यहां केवल दो चीजें संभव हैं:
- दिल्ली पुलिस पर गृह मंत्रालय के अलावा कोई और दबाव बना रहा है। ( गृह मंत्रालय के दबाव को आप कितना जायज़ मानते वो अलग बात है)
- दिल्ली पुलिस अपनी अथॉरिटी से बढ़कर फैसले ले रही है।
अगर पहली बात सत्य है तो यही साबित होता है कि गृह मंत्रालय से भी मजबूत कोई शक्ति है जो दिल्ली पुलिस को आदेश देकर सीधे अमित शाह को चुनौती दे रही। अगर दूसरी बात सत्य है फिर या तो दिल्ली पुलिस खुद को गृह मंत्री से ऊपर समझती है या शायद ये विद्रोह के संकेत हैं । दोनों ही मामलों में स्थिति चिंताजनक है और गृह मंत्री अमित शाह की योग्यता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
यह बात अब इस देश की जनता पर निर्भर करती है कि वह पुलिस द्वारा आंदोलन स्थल पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के उत्पीड़न के तर्क को सच मानती है या एक कमज़ोर गृह मंत्रालय की अयोग्यता को। या तो सरकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मांगें (जो कि भारत के संविधान द्वारा मौलिक अधिकार के रूप में आपको प्राप्त है) या गृह मंत्री से इस्तीफ़ा। तय आपको करना है।
