भारतीय बाजार और हिंदी भाषा
By Malay Nirav अगर इतिहास के आईने में झाँके तो भारतीय बाजार के कई रंग, रूप बिखरे मिलेंगे। हाट, मंडी, साप्ताहिक बाजार, दैनिक बाजार, रात्रि बाजार, लोकल बाजार, अब का शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल, ऑनलाइन बाजार। दिन, समय के आधार से लेकर सामानों के…
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम में समावेशन के बिंदु
By Malay Nirav आखिर ऐसा क्या मैं RTE दस्तावेज में पढ़-देख या फ़िर समझने का प्रयत्न कर लिया कि यह कहने के लिए बाध्य हो गया, “पूरा का पूरा RTE,2009 ही बहिष्करण का साधन है।” मैं यहां कैसे पहुंचा, आइए एक एक कर देखते हैं। मुझे कक्षा में…
आखिर क्यों आम्बेडकर संविधान को जलाने की हद तक जाने की बात कर रहे थे?
By Malay Nirav घटना साल 2013-14 की होगी! मैं इंटरनेट इस्तेमाल करने का आदी हो गया था। किसी दिन अचानक से मेरे मन में ख्याल आया कि एक नया ईमेल आईडी बनाता हूँ। हालांकि मेरे पास एक ईमेल पहले से था, लेकिन वह खुद से बनाया हुआ नहीं था बल्कि दुकान से बनवाया…
आखिर क्यों आम्बेडकर संविधान को जलाने की हद तक जाने की बात कर रहे थे?
By Malay Nirav घटना साल 2013-14 की होगी! मैं इंटरनेट इस्तेमाल करने का आदी हो गया था। किसी दिन अचानक से मेरे मन में ख्याल आया कि एक नया ईमेल आईडी बनाता हूँ। हालांकि मेरे पास एक ईमेल पहले से था, लेकिन वह खुद से बनाया हुआ नहीं था बल्कि दुकान से बनवाया…
न्यू इंडिया: कटी-फटी जीन्स का दौर और हमारी अदालतें।
By Malay Nirav पुलिस हो या राजनेता, इनका स्त्री-फोबिया चेहरा सामने आता रहता है लेकिन आजकल इस फेहरिस्त में न्यायमूर्ति भी शामिल होने लगे हैं। आखिर क्यों? भारत देश में आज भी नागरिक न्यायालय पर औरों के बनिस्पत ज्यादा भरोसा करते हैं। उसी न्याय के…
जिन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता नहीं वो गृह मंत्री से इस्तीफा मांगे
By Gautam Kumar 2 फरवरी को न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार निधि सुरेश को सिंघु बॉर्डर के किसान आंदोलन स्थल पर यह कहते हुए जाने से रोका गया कि केवल “राष्ट्रीय मीडिया अधिकृत प्रेस कार्ड” वाले लोग ही जा सकते हैं। किसी भी सरकारी या…
अनब्याही माँ : कलंक या कर्तव्य
By Pooja Kumari “जब कभी हम सुनते हैं कि पैदा करने वाली माँ ने बच्चे को कूड़े के ढेर या कहीं फेंक दी, हमारे भीतर की मानवीयता जाग उठती है, उस बच्चे के साथ रिश्ता जोड़ तड़प उठते हैं और कहते है कि ‘हाय, कैसी माँ होगी जो उस मासूम को छोड़…
दक्षिणपंथी राजनीति में कितना राष्ट्रवाद ?
By Malay Nirav राष्ट्रवाद नहीं, भ्रमवाद! वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का उभार देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इन्हें राष्ट्रवादी भावना का पोषक मानते हैं। हो सकता है, इनमें से कुछ सच में राष्ट्रवादी विचारधारा से इत्तेफ़ाक़…
मानवता की कहानी
By Malay Nirav हम, तथाकथित सभ्य और श्रेष्ठ इन्सान, पंछी की तरह खुले आसमान में मुक्त उड़ना चाहते हैं लेकिन क्या हम इन पक्षियों की तरह मरना चाहेंगे? आप सोच रहे होंगे कि मैं यह बेतुका-सा सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ? शायद आप जानते हों या न भी जानते हों…
विकासमय विनाश या विनाशमय विकास !
By Pooja Kumari विकास को बहुरंगी, सतरंगी होना चाहिए। एकरंगी विकास एक के लिए विकास हो सकता है तो दूसरे के लिए विनाश। एकरंगी विकास कब विनाश में तब्दील हो जाएगा, यह अनुमान से परे है। वैसे तो विनाश और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन ईमानदार प्रयास और…