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आखिर क्यों आम्बेडकर संविधान को जलाने की हद तक जाने की बात कर रहे थे?

By gautamjkr1995@gmail.com
April 20, 2021 8 Min Read
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By Malay Nirav

 घटना साल 2013-14 की होगी! मैं इंटरनेट इस्तेमाल करने का आदी हो गया था। किसी दिन अचानक से मेरे मन में ख्याल आया कि एक नया ईमेल आईडी बनाता हूँ। हालांकि मेरे पास एक ईमेल पहले से था, लेकिन वह खुद से बनाया हुआ नहीं था बल्कि दुकान से बनवाया हुआ था। सोचते-सोचते एक नाम पसंद आया जिससे मैं अपना नया ईमेल बनाता, साथ ही इस नाम को जीमेल भी स्वीकार कर रहा था। यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात थी। वह ईमेल कुछ ऐसा था  malayniravram@gmail.com, अपने नाम के साथ भगवान “राम” का नाम देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न था क्योंकि भगवान “राम” अन्य भगवान की तुलना में मेरे बेहद करीब और आत्मीय हैं। अपनी इस खुशी को मैं अपने दोस्तों से भी बांटना चाह रहा था। एक अजीज दोस्त को जब इस नए ईमेल के बारे में बताया तो उसकी पहली प्रतिक्रिया देख मैं चौंक गया था। वह पूछता है, “क्या तुम दलित हो?” यह बात मेरे गले नहीं उतरी। मैं “हाँ” बोल दिया। फ़िर मैंने पूछा कि तुम्हें मेरे नए ईमेल आईडी से कैसे पता चल रहा है कि मैं दलित हूँ! वह मुस्कुरा कर बोला,”अरे यार, तुम अपने नाम के आगे ‘राम’ लिखे हो उससे मुझे पता चला।” मेरे लिए यह एक नई लेकिन असंवेदनशील जानकारी थी कि लोगों को, उपाधि से भी जाति का पता चल जाता है। हालांकि मन में एक खुशी भी थी कि मेरे नाम से कोई मेरी जाति का पता नहीं लगा सकता है।

आप सोच रहे होंगे कि साल 2021 में मैं यह क्यों याद कर रहा हूँ ? जब-जब जाति-आधारित कोई विमर्श सवाल बनकर मन में उभरता है तो मैं खुद को इस घटना को याद करने से नहीं रोक पाता हूँ। एक तरह से यह वाकया मेरे जीवन में जाति आधारित विमर्श का प्रस्थान बिंदु है।

BR Ambedkar

Photo Credit: DNA India


 14 अप्रैल! यह तारीख वर्ष के कैलेंडर में एक विशेष स्थान रखता है। आंबेडकर जयंती। भले ही आप अपनी माशूका का जन्मदिवस भूल जायें लेकिन इस दिन को कभी मत भूलिएगा! भारत-रत्न आम्बेडकर हर एक भारतीय के जीवन को आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से प्रभावित करते हैं एवं उनके जीवन में विशिष्ट अहमियत रखते हैं। कहा जा सकता है कि सबके अपने-अपने आम्बेडकर हैं !

क्या नहीं थे आम्बेडकर! समाज-सुधारक, विधिवेत्ता, सम्पादक, अर्थशास्त्री, शिक्षक, संविधान-निर्माता, पुस्तक-प्रेमी, समाजशास्त्री, शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ, लेखक … और भी बहुत कुछ। अपने समय में भारतवर्ष के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे इन्सान थे।

आम्बेडकर को पढ़ते हुए कुछ एक सवाल मन में कौंध रहा था, जो आपके सामने रखता हूँ। हालांकि आम्बेडकर को पढ़ना-जानना कभी नहीं खत्म होने वाली एक यात्रा है। क्या आम्बेडकर अपने जीवन के आखिरी वर्षों में पलायनवादी हो गए थे? यह सवाल उनका हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्धधर्म अपनाने के संदर्भ में उभरा है। क्या वह हिन्दू धर्म की कुरीतियों, स्त्री विरोधी-जातिवादी-संप्रदायवादी मानसिकता के सामने घुटने टेक दिये और पलायन का आसान रास्ता अपना लिये? ‘हिन्दू कोड बिल’ संसद में पारित नहीं हो पाने की वजह से ही उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन सुधार और अधिकार सिर्फ़ हिन्दू महिला को ही क्यों मिलना चाहिए था ? मुस्लिम-ईसाई-पारसी सहित अन्य धर्म की महिला को क्या एक गरिमामय जीवन जीने का हक नहीं था जैसा कि उनकी नज़र में हिन्दू महिला के लिए था ?

यह बात बेहद आम है कि गांधी और आम्बेडकर में एक विषम प्रतिद्वंदिता थी। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे, हालांकि अधिकतर समय उनके विचार दो ध्रुवीय हुआ करते थे। बीबीसी को इंटरव्यू देते हुए आम्बेडकर गाँधी की तीखी आलोचना करते हुए कहते हैं कि ‘आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था। लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाज़ा मैं कह सकता हूँ कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुक़ाबले गांधी को बेहतर समझता हूँ।’ आंबेडकर ने इंटरव्यू में गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा, “गांधी हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे। उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले। पहला ‘हरिजन’ अंग्रेज़ी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप ‘दीनबंधु’ या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं। अंग्रेज़ी समाचार पत्र में उन्होंने ख़ुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और ख़ुद को लोकतांत्रिक बताया। लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे। वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे। दरअसल किसी को गांधी के ‘हरिजन’ में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए।”

क्या हम आम्बेडकर पर एक धर्म विशेष की महिला के प्रति ज्यादा फ़िक्रमंद होने का वहीं दूसरे धर्म की महिला के प्रति लापरवाह होने की हद तक बेफ़िक्र होने का आरोप लगा सकते हैं? आखिर उनकी क्या मज़बूरी होगी जो वह इस बात पर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा नहीं दे पाए कि यह सिर्फ़ ‘हिन्दू कोड बिल’ क्यों है, बल्कि इसे ‘हिन्दू एवं अन्य धर्म कोड बिल’ होना चाहिए था? क्या आम्बेडकर की सोच सिर्फ़ हिन्दू धर्म के संदर्भ में प्रगतिशील थी वहीं अन्य धर्म के प्रति यथास्थितिवादी? या फ़िर आम्बेडकर समझौतावादी दृष्टिकोण को अपना रहे थे? आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों ?

आज आम्बेडकर कितने प्रासंगिक हैं? कुछ एक अपवादों को छोड़कर, जैसे आम्बेडकर सत्ता का विकेंद्रीकरण (जैसे पंचायती राज व्यवस्था) के जगह केंद्रीकरण के पक्षधर थे, उनकी सोच और उनका विचार आज भी न केवल प्रासंगिक है बल्कि देश-समाज के लिए ऑक्सीजन-तुल्य उपयोगी एवं आवश्यक है। आईए एक नजर डालते हैं उनके कुछ चुनिंदा कालजयी विचारों पर-


*****

“लोकतंत्र शासन की वह पद्धति है, जिसमें लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में बदलाव बग़ैर ख़ूनख़राबे के संभव है।”

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी है।”

“मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है।”

“पानी की एक बूंद जो समुद्र में शामिल होते ही अपनी पहचान खो देती है, लेकिन व्यक्ति को समाज में अपना अस्तित्व नहीं खोना चाहिए जिसमें वह रहता है। मनुष्य का जीवन स्वतंत्र है। उनका जन्म समाज के विकास के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के विकास के लिए हुआ है।”

“राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं चल सकता जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं होता। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है ? इसका मतलब जीवन का एक तरीका है जो जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को पहचानता है।”

“यदि हम एक एकीकृत आधुनिक भारत बनाना चाहते हैं तो सभी धर्मों के धर्मग्रंथों की संप्रभुता समाप्त होनी चाहिए।”

“जीवन लंबा होने के बजाय महान होना चाहिए।”

“समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।”

“मैं किसी कौम की उन्नति को उस कौम की स्त्रियों की उन्नति से मापता हूँ।”

“अगर वास्तव में हिंदू राज बन जाता है तो यह इस देश के लिए भारी खतरा उत्पन्न हो जायेगा। हिंदू कुछ भी कहें पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए एक खतरा है। इस आधार पर लोकतंत्र के लिए यह अनुपयुक्त है।”

“जाति श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है।”

“अपनी शक्तियां किसी व्यक्ति – भले वह कितना ही महान क्यों न हो – के चरणों में रख देना या उसे इतनी ताकत दे देना कि वह संविधान को ही पलट दे। संविधान और लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है।”

“धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा , पतन का निश्चित रास्ता है और जो आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है।”

“जाति की मुख्य विशेषता जाति के अंदर ही शादी करना है। कोई स्त्री अपनी इच्छा से शादी नहीं कर सकती। इसके लिए प्रेम पर भी रोक लगा दी गयी। बाल विवाह की कुरीति और विधवाओं के साथ सलूक तथा विधवा विवाह पर रोक इसी के लिए हैं।”

“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”

“संविधान कितना भी अच्छा बना लें, इसे लागू करने वाले अच्छे नहीं होंगे तो यह भी बुरा साबित हो जाएगा।”

“अगर मुझे लगता है कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो मैं सबसे पहले इसे जलाऊंगा।”

*****


आम्बेडकर के ये विचार हमें जगाती हैं। भीतर तक झकझोर कर रख देती हैं। हमें जागरुक करती हैं, जीने का सलीका सिखाती हैं। हो सकता है कि कोई अपने राजनैतिक लाभ या व्यक्तिगत मतभेद की वजह से उनके विचारों को खारिज कर दे, नकार दे पर वो एक ऐसी चिंगारी है जो इन्साफपरस्त, लोकतांत्रिक नागरिक को हमेशा प्रेरित करती रहेगी। उन्हें अपने हक के प्रति सचेत रहने और उसके लिए भी  लड़ने को प्रेरित करती रहेगी।

क्या आप भी यहां उद्धरित आम्बेडकर के आखिरी कथन को पढ़कर चौंके या फ़िर क्या आपके लिए भी एकबारगी इस पर यकीन करना कठिन प्रतीत हो रहा है? शायद आपका जवाब हाँ हो! मेरे लिए भी इस पर यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि कैसे संविधान का निर्माता ही उसको जलाने की बात कर रहा है? लेकिन यह सौ फीसदी उनके द्वारा ही कहा गया कथन है। 2 सितंबर 1953 को राज्यसभा में उन्होंने यह बात कही थी। उनका कहना था कि छोटे समुदायों और छोटे लोगों को यह डर रहता है कि बहुसंख्यक उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं और ब्रितानी संसद इस डर को दबा कर काम करती है। श्रीमान, मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है। पर मैं यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ कि इसे जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होउंगा। मुझे इसकी जरूरत नहीं। यह किसी के लिए अच्छा नहीं है। पर, फिर भी यदि हमारे लोग इसे लेकर आगे बढ़ना चाहें तो हमें याद रखना होगा कि एक तरफ बहुसंख्यक हैं और एक तरफ अल्पसंख्यक, और बहुसंख्यक यह नहीं कह सकते कि ‘नहीं, नहीं, हम अल्पसंख्यकों को महत्व नहीं दे सकते क्योंकि इससे लोकतंत्र को नुकसान होगा।’ मुझे कहना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुंचाना सबसे नुकसानदेह होगा। 

आखिर क्यों आम्बेडकर संविधान को जलाने की हद तक जाने की बात कर रहे थे? इसका जवाब दो साल बाद, 19 मार्च 1955 को राज्यसभा में डॉ. अनूप सिंह द्वारा पूछे जाने पर देते हैं। उनका जवाब था, “आपको उसका जवाब चाहिए? मैं अभी, यहीं आपको जवाब दूंगा। मेरे मित्र ने कहा कि मैंने कहा था कि मैं संविधान को जलाना चाहता हूँ, पिछली बार मैंने जल्दी में इसका कारण नहीं बताया। अब जब मेरे मित्र ने मुझे मौका दिया है तो मुझे लगता है कि मुझे कारण बताना चाहिए। कारण यह है कि हमने भगवान के रहने के लिए एक मंदिर बनाया पर इससे पहले कि भगवान उसमें आकर रहते, एक राक्षस आकर उसमें रहने लगा। अब उस मंदिर को तोड़ देने के अलावा चारा ही क्या है? हमने इसे असुरों के रहने के लिए तो नहीं बनाया था। हमने इसे देवताओं के लिए बनाया था। इसीलिए मैंने कहा था कि मैं इसे जला देना चाहता हूँ।”

आम्बेडकर मानवता के प्रति अपने अतुलनीय योगदान के लिए न केवल देश बल्कि विदेशों में भी सराहे और याद किए जाते हैं। अनुसूचित जाति के लोग उन्हें देवतातुल्य एवं मसीहा मानते हैं। लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि आज अनुसूचित जाति के लोग उस मुकाम तक पहुँच पाए हैं जहां आम्बेडकर उनको पहुंचाना चाहते थे? शायद नहीं! आम्बेडकर के बाद उनके कद का कोई भी नेता अनुसूचित जाति से निकलकर सामने नहीं आ पाया है। आज के दलित राजनेता सिर्फ़ वोट बैंक की राजनीति करते हैं। उन्हें आम्बेडकर की सोच, विचारधारा से कोई लेना देना नहीं है। वे बस सत्ता, पद और धन के लालची हैं। क्या आप एक भी अनुसूचित जाति के राजनेता का नाम बता सकते हैं जो वर्तमान समय में अपने समाज-देश के उत्थान-विकास के लिए धरातल पर काम कर रहा हो? कुछ दलित राजनेता के नाम भले ही आपके जेहन में आ रहे हों जैसे रामदास अठालवे, अर्जुन राम मेघवाल आदि, लेकिन ये प्रसिद्ध किस वजह से हुए हैं, शायद आप भी जानते होंगे! एक “गो कोरोना गो” गाना गा कर, वहीं दूसरे महाशय “भाभी जी पापड़” का प्रचार कर। दोनों राजनेता इस तरह कोरोना महामारी से लड़ने के लिए अपने समाज-देश को प्रेरित कर रहे थे। समाज को जागरूक करने के जगह पर ये उसको और ज्यादा अंध-विश्वासी एवं भक्ति के मार्ग पर ले जा रहे हैं। क्या ऐसे राजनेता आम्बेडकर के ध्येय को पूरा कर पाएंगे ? 

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