भारतीय बाजार और हिंदी भाषा
अगर इतिहास के आईने में झाँके तो भारतीय बाजार के कई रंग, रूप बिखरे मिलेंगे। हाट, मंडी, साप्ताहिक बाजार, दैनिक बाजार, रात्रि बाजार, लोकल बाजार, अब का शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल, ऑनलाइन बाजार। दिन, समय के आधार से लेकर सामानों के प्रकार के हिसाब से भी…
ना…ना…ना…सुनना-पढ़ना-सुनाना
प्रतीकात्मक फोटो यूट्यूब की दुनिया ब्रह्मांड जैसी लगती है, अनंत…अंतहीन…हाथ डालो अंदर और कुछ न कुछ जरूर निकल आएगा। स्क्रोल करते जाओ, करते जाओ, आकाश को देखते जाओ…देखते जाओ, आकाश नहीं खत्म होता, हमारा देखना ठहर जाता है, यूट्यूब हमारा आकाश…
घो घो रानी कितना पानी? इतना पानी.. इतना पानी
प्रतीकात्मक तस्वीर “घो घो रानी कितना पानी” …”सुपली भर पानी”… “ठेवना भर पानी”…”कमर भर पानी”। इस बाल गीत को कभी न कभी हम सब जरूर सुनें होंगे, खेले होंगे यह खेल अपने-अपने बचपन में। यहाँ…
प्रेमचंद का आना…
लेखक मलय नीरव वाराणसी के लमही गांव में जन्म लेने वाले प्रेमचंद को उनकी जयंती पर पूरे देश दुनिया के साहित्यकारों ने याद किया और उनके बारे में लिखा भी। मेरी दृष्टि में हर विद्यार्थी के जीवन में प्रेमचंद आते हैं, कभी हीरा-मोती के माध्यम से तो कभी नमक का…
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम में समावेशन के बिंदु
आखिर ऐसा क्या मैं RTE दस्तावेज में पढ़-देख या फ़िर समझने का प्रयत्न कर लिया कि यह कहने के लिए बाध्य हो गया, “पूरा का पूरा RTE,2009 ही बहिष्करण का साधन है।” मैं यहां कैसे पहुंचा, आइए एक एक कर देखते हैं। मुझे कक्षा में प्रस्तुति के लिए टॉपिक मिला…
वो कहानी जो कहानी नहीं थी!
यह कहानी कभी की नहीं है, न आज की, न बीते हुए कल की और न ही आने वाले कल की। यह कहानी न धरती की है, न अन्तरिक्ष की और न ही पाताल की। कहानी क्षणभंगुर है। हर शब्द लिखते ही मिटता भी जा रहा है। जब कहानी पढ़ा जा रहा होगा तब उसकी…
न्यू इंडिया: कटी-फटी जीन्स का दौर और हमारी अदालतें।
पुलिस हो या राजनेता, इनका स्त्री-फोबिया चेहरा सामने आता रहता है लेकिन आजकल इस फेहरिस्त में न्यायमूर्ति भी शामिल होने लगे हैं। आखिर क्यों? भारत देश में आज भी नागरिक न्यायालय पर औरों के बनिस्पत ज्यादा भरोसा करते हैं। उसी न्याय के मन्दिर से लैंगिक…
म्यांमार: कब तक कैद में रहेंगी ‘आंग सान सू’
Written by Pooja Kumari & Malay Nirav बालों में रंग-बिरंगे फूल, मासूम व तेजस्वी चेहरा, गुड़िया जैसी दिखती एक अधेड़ उम्र की लड़की, दुबला पतला शरीर पर मन से बाघिन, शान्ति का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित, आंग सान सू की! लगभग 15 वसंत-पतझड़ नजरबंदी में व्यतीत…
‘जल ही जीवन है’ से ‘जितना जल उतना ही जीवन’ तक
“जल ही जीवन है” को बदलकर अब “जितना जल उतना ही जीवन” हो जाना चाहिए। एक समय था, शायद यह समय आपके जीवन में भी आया होगा, जब प्यास लगती थी, हाथ को ही ग्लास बना नलकूप से पानी पी लेता था। कोई डर नहीं था, पीने से पहले कभी भी यह नहीं सोचता…