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satire

फ़कीरी

By gautamjkr1995@gmail.com
May 14, 2021 3 Min Read
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By Malay Nirav,  

आज का युग फ़कीरी और भिखारी का युग है। सड़क पर चलते, ट्रेन में बैठे, हवाई यात्रा करते हुए आप देखेंगे कि हर दूसरा आदमी फ़कीर है तो वहीं हर पहला आदमी भिखारी। समय इतना मॉडर्न हो गया कि भीख भी अपना नाम बदलकर फंड रख लिया है। जब तक सामने वाला समझेगा कि वह तो भीख माँग रहा था तब तक उसका जेब खाली हो चुका होता है। हो सकता है कि आपका भी दो-तीन नाम हो। अपने एक नाम को आप श्रेष्ठ मानते हों वहीं दूसरे को दोयम। ऐसा ही कुछ भीख के साथ भी है। उसके भी आजकल कई प्रचलित नाम हैं। भिक्षा, फंड, डोनेट, चंदा, रिश्वत आदि।

Representational Cartoon for Privatisation in India

Credit: Nituparna Rajbongshi


एक समय था जब सिर्फ़ भिखारी भीख मांगता था और ऋषि-मुनि भिक्षा। लेकिन आजकल यह पेशा बहुआयामी-बहुमुखी-मूल्यवान हो गया है। आज जिसका कद जितना ऊँचा होता है वह उतना ही बड़ा भिखारी होता है। मन्दिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा सहित बस-रेलवे स्टेशन पर भीख मांगने वाले भिखारी को लोग हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको दोयम दर्जे का भिखारी समझा जाता है। जंगल के मूलवासी आदिवासी का जो हाल जंगल में है वही हाल सड़क पर भीख मांगने वाले पारंपरिक भिखारी का है। अपने ही पेशा में वे बेआबरू हैं। वहीं सेवन स्टार होटल में बैठकर भीख मांगने वाले को लोग पूजते हैं, कभी-कभार पीएम-सीएम भी बना देते हैं।

भिखारी से फ़कीर बनने की यात्रा दुर्गम रास्ते से होकर निकलती है। एक-आध विरले की ही यह यात्रा पूर्ण हो पाती है। मैं पूर्ण विश्वास से कह सकता हूँ कि पेशा में श्रेष्ठ पेशा फ़कीरी का पेशा होता है। यह एक मात्र ऐसा पेशा है जिसमें आप देश-दुनियादारी से पूर्णतः चिंता मुक्त होते हैं। उलटे दुनिया-जहान वाले आपकी दुनियादारी का भरपूर ख्याल रखते हैं।

एक जमाना था जब टूटा-फूटा कटोरा को भीख और भिखारी का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज हाथ से कटोरा गायब हो गया है, उसके बदले में स्मार्टफ़ोन आ गया है। हां जिनके हाथ में कटोरा दिख जाता है, लोग उसको भिखारी नहीं अभागा कह अपमानित करते हैं। वहीं आजकल अधनंगा या वस्त्रहीन को नहीं बल्कि सूट-बूट तो कभी-कभार स्वदेशी सतरंगी वस्त्रधारी को फ़कीर कहा जाने लगा है।

जिस तरह फ़कीर होने के लिए अधनंगा होना अनिवार्य नहीं है वैसे ही अब अमर होने के लिए मरने का इन्तज़ार करना निहायत ही बेवकूफ़ाना माना जाने लगा है। अमर होना है तो रख लीजिए अपने घर का नाम अपने नाम पर। घर अगर पराये का हो तो आपकी अमरता में चार चाँद भी लग जाएगा। जीवन तो उसी का सफ़ल है जिसके पास अमरता और फ़कीरी है, अन्यथा जीवन तो गाँधी भी जी रहे हैं, असफ़ल और नीरसमय जीवन।

परिशिष्ट

एक वो भी जमाना था जब जनता अपने नेता से महंगाई डायन से बचाने का आह्वान किया करते थे और नेता भी बचा लिया करते थे। लेकिन आज। आज तो जनता को ही महंगाई से कोई लेना देना नहीं है। वो तो भक्ति में लीन है। फ़िर नेता के पास कौन जायेगा। लेकिन नहीं, ठहरिये, जाने वाले आज भी जा रहे हैं। अब जनता नहीं ठेकेदार-कॉरपोरेटर जाते हैं नेता के पास। उनसे कहते हैं कि हुजूर आजकल महंगाई नहीं बढ़ रही है, मुनाफ़ा भी दोगुना से चौगुना नहीं हो पा रहा है, कुछ कीजिए। नेता भी मददगार होते हैं, खाली हाथ कैसे लौटा देंगे। अगले दिन अखबार में राष्ट्रवाद और जनता का योगदान पर लंबे-लंबे सम्पादकीय छपते हैं, और कहीं कोने में नज़र से दूर दाम बढ़ने का बधाई संदेश। 

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gautamjkr1995@gmail.com

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