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दक्षिणपंथी राजनीति में कितना राष्ट्रवाद ?

By gautamjkr1995@gmail.com
January 19, 2021 4 Min Read
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By Malay Nirav

राष्ट्रवाद नहीं, भ्रमवाद! वर्तमान समय में विश्व के अनेक देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का उभार देखा जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इन्हें राष्ट्रवादी भावना का पोषक मानते हैं। हो सकता है, इनमें से कुछ सच में राष्ट्रवादी विचारधारा से इत्तेफ़ाक़ रखते हों लेकिन अधिकतर देशों में यह देखा जा रहा है कि तथाकथित राष्ट्रवादी दल जनता को भ्रमित कर रहे हैं। फेक खबरों के माध्यम से आम नागरिक की भावनाओं में उन्माद का तड़का लगा रहे हैं। मुझे ऐसे दलों को राष्ट्रवादी कहने में संकोच होता है। राष्ट्रवाद को रवींद्रनाथ ठाकुर मानवतावाद की तुलना में हेय मानते थे। वे भले ही कहा करते थे कि हीरे के दाम ( मानवतावाद ) में शीशा का ग्लास ( राष्ट्रवाद ) नहीं खरीदूंगा लेकिन वर्तमान समय के तथाकथित राष्ट्रवादी दल को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि ठाकुर जी आज होते तो राष्ट्रवाद की तुलना प्लास्टिक का ग्लास से करते। हालांकि मुझे राष्ट्रवाद से सकारात्मक भावना की खुशबू आती है, मानवतावाद जैसी। जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर राष्ट्रवाद कहकर हेय नज़र से देखा करते थे, उसे मैं राष्ट्रवाद नहीं मानता हूँ। वह राष्ट्रवाद को बदनाम करने वाली एक विकृत सोच मात्र है, जिसको राष्ट्रवाद का जामा पहनाकर राजनेता/शासक/तानाशाह नागरिक को भ्रमित करते हैं। मैं इसे “भ्रमवाद” कहता हूँ।


Photo Credit: The New Yorker



राष्ट्रवाद, मुख्यतः राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का नाम है। आजकल के तथाकथित राष्ट्रवादी ( भ्रमवादी ) पार्टी देश और जन को बाँटने का काम कर रही है। उनका ध्येय राष्ट्र नहीं सत्ता की कुर्सी है। कुर्सी के लिए वे जनता में भ्रम और मनभेद को बढ़ाते हैं। इनका प्रमुख सूत्र होता है “बांटों और राज करो” जबकि राष्ट्रवाद “जियो और जीने दो” के बुनियाद पर टिका है।


राष्ट्रवाद न सिर्फ़ देश में रहने वाले इंसानों का ख्याल रखता है बल्कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी, झील, पर्वत-पठार, वन, वायु सभी का सम्मान करता है। राष्ट्रवादी एक के फायदे के लिए दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, बल्कि एक की जिन्दगी लिए दूसरे की जिन्दगी को बचाते हैं। वहीं हम देख रहे हैं कि तथाकथित राष्ट्रवादी ( भ्रमवादी ) हमेशा इसी ताक में रहते हैं कि कब विकास के नाम पर जल-जंगल-जमीन को लूट लें या फ़िर वन की रक्षा के नाम पर उनमें रहने वाले आदिवासी-वनवासियों को निकाल फेंके। इनका उद्देश्य समाधान नहीं विवाद होता है।


राष्ट्रवाद कोई बन्द किताब नहीं है बल्कि यह एक खुली किताब होती है। यह पिंजरा नहीं मुक्त गगन है। इसमें अलगाव का नहीं सहयोग का भाव होता है। यह निषेध का नहीं प्रवेश का मार्ग है। राष्ट्रवाद सत्ता को अहं नहीं सन्तत्व सिखाता है। यह रंगों का बंटवारा नहीं, रंगों का मेल इन्द्रधनुष है। यह सृजनात्मक होता है न कि विध्वंसात्मक। यह नैसर्गिक है, कृत्रिम नहीं। राष्ट्रवाद, सिर्फ़ सड़क बनाना ही नहीं है बल्कि सड़क पर चलने वाले गरीब, मजदूर के पैरों में चप्पलों के लिए प्रयत्नशील होना भी है। यह विविधता में एकता है और एकता में विविधता भी।


राष्ट्रवाद अतीत, वर्तमान और भविष्य का समन्वय है। यह अतीतफोबिया नहीं होता है। यह सिर्फ़ महान सपूतों का गुणगान नहीं करता बल्कि आपको भी गुणवान बनाता है। यह बहता जल है न कि ठहरा पानी। यह सबजन सुखाय सबजन हिताय होता है। वहीं आजकल का तथाकथित राष्ट्रवाद ( भ्रमवाद ) जंगल की आग की तरह है जिसका शिकार सिर्फ़ मासूम प्राणी ही नहीं होते बल्कि इसकी आग शिकारी को भी झुलसा देती है, जला देती है। राष्ट्रवाद गर्मी में शीतलता, ठंड में गर्माहट, बारिश में ओट और बसंत की हरियाली-सा एहसास है। वहीं आजकल तूफानी झंझावात पैदा करने वाले ख़ुद ही ख़ुद को राष्ट्रवादी होने का सर्टिफ़िकेट बाँटते घूम रहे हैं। राष्ट्रवाद वाचाल की उद्घोषणा नहीं वीणा की झंकार/मूक की पुकार है। यह ‘साझा प्रतिबद्धता’ है न कि ‘आपसी प्रतिद्वंदिता’।

राष्ट्रवाद सांप्रदायिक होना नहीं सिखाता है बल्कि यह सर्वधर्म समभाव होना सिखाता है। यह लोगों में श्रद्धा एवं विश्वास की भावना का विकास करता है न कि घृणा और विश्वासघात की भावना का। हालाँकि आजकल के तथाकथित राष्ट्रवादी ( भ्रमवादी ) खुद को ज्यादा से ज्यादा सांप्रदायिक-नस्लभेदी दिखाने में यकीन रखते हैं। समाज और राष्ट्र में घृणा फैलाना ही उनका स्वभाव होता है। राष्ट्रवाद की धुरी कभी भी अन्य देशों से नफ़रत पर नहीं टिकी होती है बल्कि यह खुद से, अपने देश से, मानव से, प्रकृति से प्रेम पर टिकी होती है।

सब कहा ही राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि बहुत कुछ अनकहा भी राष्ट्रवाद है। यह नित्य नवीन और अद्यतित होता रहता है। यह सत्य, सनातन एवं शाश्वत है। जयकारा ही राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि मौन भी राष्ट्रवाद है। यह व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से व्यष्टि के बीच की यात्रा है। यह विस्थापन नहीं, पुनर्वास है। राष्ट्रवाद न सिर्फ़ आपको उत्साही बनाता है बल्कि सहिष्णु होना भी सिखाता है। भ्रमवाद मृगमरीचिका है तो वहीं राष्ट्रवाद हकीकत। शेष कुछ नहीं “मैं” का त्याग ही ‘राष्ट्रवाद’ है। 

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gautamjkr1995@gmail.com

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