By Pooja Kumari
“जब कभी हम सुनते हैं कि पैदा करने वाली माँ ने बच्चे को कूड़े के ढेर या कहीं फेंक दी, हमारे भीतर की मानवीयता जाग उठती है, उस बच्चे के साथ रिश्ता जोड़ तड़प उठते हैं और कहते है कि ‘हाय, कैसी माँ होगी जो उस मासूम को छोड़ गई? यह हमारी कैसी दोहरी मानसिकता है, जो एक अनब्याही माँ और उसके बच्चे को स्वीकार नहीं करता है और जब वो झूठी समाजिक कलंक से बचने की कोशिश करती है तब भी यह समाज उसे ही निष्ठुर कहती है।”
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| Photo Credit: UNICEF |
मोटरसाइकिल की गति थोड़ी धीमी हुई कि नजरें मानो कहीं टिकना चाहती थी। सड़क के किनारे दुकानें, आस-पास लगे ठेले, बाज़ार की भीड़। आखिरकार मेरी नजर टिकी, एक महिला पर। सबसे पहले नज़र उसकी पेट पर गई, जिससे पता चला कि उसमें एक नवजीवन पल रहा है। नन्हें मेहमान के आने का इंतज़ार उसकी आँखों में साफ़ देख पा रही थी और साथ ही मैं खुद को एक माँ के एहसास में खोती महसूस करने लगी। अब नज़र आँख से हट उसकी माँग पर जा कर रुकी, जो लाल सिन्दूर से भरा था। सिन्दूर देख कर मेरा मन एक पल को रुक-सा गया। अचानक से ख्याल आया एक अनब्याही माँ का। फ़िर सब साधारण-सा प्रतीत हुआ ! और हो भी क्यों न ? यह समाज अनब्याही माँ को कभी स्वीकार नहीं करता है। वह समाज में गाली की तरह होती है, लोगों की तीखी नजरें उन्हें पल-पल मरने को मजबूर करती हैं। वह फूटपाथ पर बहुत ही धीमी गति से चल रही थी, शायद चलने में परेशानी हो रही थी। ठंड के दिन में भी पसीने की कुछ बूँदें उसकी ललाट पर चमक रही थी। वह परेशान तो थी पर आने वाली खुशियों की एहसास इस परेशानी को फ़ीकी कर रही थी। आँखों में चमक के साथ उसकी होठों पर मुस्कान बिखरी हुई थी। अपनी चुन्नी से पेट को ढककर उसे एक हाथ से सहला रही थी मानों सड़क की भीड़ में उसे महफ़ूज महसूस करा रही हो और अपने सफ़र का किस्सा उसे सुना रही हो। यही तो होती है ना माँ। प्रसव पीड़ा में भी अपने बच्चों की सुरक्षा-बोध से भरी रहती है। उसके लिए अनेक सपने अपनी आँखों में सजाती हैंं। फ़िर चाहे वह ब्याही हो अनब्याही माँ, भावनाएँ एक ही होती हैं। आप या हम माँ बनने की सुखानुभूति को ब्याही और अनब्याही की श्रेणी में बाँट कर नाप-जोख नहीं सकते हैं। फ़िर भी हमेशा कोशिश यही करते रहते हैं।
मैं सोचती हूँ कि आखिर यह अनब्याही माँ क्या है; जिन्हें हम घृणित समझते हैं। इसमें उनकी क्या गलती है ? आखिर किस गुनाह के लिए उन्हें समाज की घृणा सहनी पड़ती है ? अनब्याही माँ बनने का सीधा मतलब यही है कि वो किसी से बेइंतहा प्यार करती थी, जो फलीभूत हुआ या फ़िर किसी दरिंदे ने जोर-जबरदस्ती कर उसे माँ बनने पर मजबूर किया। इसमें उनका गुनाह क्या है ? प्यार करना या फ़िर बलात्कारी का शिकार बनना !
“अनब्याही माँ बनने का सीधा मतलब यही है कि वो किसी से बेइंतहा प्यार करती थी, जो फलीभूत हुआ या फ़िर किसी दरिंदे ने जोर-जबरदस्ती कर उसे माँ बनने पर मजबूर किया।”
क्या मात्र शादी ही प्रेम का आधार हो सकता है ? मैं मानती हूँ कि शादी बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण संस्कार है पर क्या इसकी पवित्रता बचाने के नाम पर आप शोषण के अधिकारी हो जाते हैं ? प्रेम शादी करने की एकमात्र आधार क्यों नहीं हो सकती है ? शादी का मनोविज्ञान क्या कहता है ? परिवार और समाज दो अजनबी को शादी के पवित्र बँधन में बाँध, उन्हें जिंदगी भर साथ रहने का आशीर्वाद देते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि उनके बीच प्यार, एक-दूसरे की समझ है भी या नहीं। शादी के बाद उनके बीच प्रेम हो जाएगा, इसकी कल्पना हमारा समाज कर लेता है, वह दो नहीं जिन्हें साथ रहना है। भले ही इसकी असफ़लता के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं परन्तु इसे कभी भी गलत माना नहीं गया है। वहीं दूसरी ओर अगर दो लोग एक-दूसरे को धीरे-धीरे समझते हैं, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं, प्रेम करते हैं और बहुत सोच-समझ कर यह तय करते हैं कि हाँ हमें जिंदगी भर एक-दूसरे के साथ रहना है तब भी हमारा समाज इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करता है। अपवाद स्वरूप अगर कुछ को छोड़ दें तो शेष समाज ऐसे रिश्ते को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं। उनकी मानसिकता यह होती है कि इसकी शुरुआत देह से हुई है इसलिए गंदी है जबकि हकीकत यह है कि ये रिश्तें मन से शुरु होती हैं। वहीं आमतौर पर परिवार-समाज द्वारा तय विवाह-संस्कार में रिश्ता देह से शुरु हो मन तक पहुँचता है। कई रिश्ते तो ऐसे हैं जो मन तक कभी पहुँच ही नहीं पाते हैं, फ़िर भी खींच कर किसी तरह ढ़ोते हैं, वह भी अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए।
सन्तान-सुख ! जहाँ एक ओर बिना प्रेम के शुरु हुए रिश्ते से प्राप्त सन्तान को हम प्यार की निशानी मान उत्सव मनाते हैं वहीं दूसरी ओर प्रेम से शुरु हुए रिश्ते से प्राप्त सन्तान को हम घृणास्पद समझ उसकी उपेक्षा करते हैं। अगर कहीं इस रिश्ते में किसी लड़की को धोखा मिले तो यह समाज-परिवार उसका साथ देने, दुखों में सहभागी बनने के जगह उसके लिए दुखों का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। उसे चरित्रहीन कह समाज की गन्दगी बता देते हैं। एक माँ की पूजा और दूसरी को गाली, यह कैसा समाज है ?
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| Photo Credit: Yourstory.com |
