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मानवता की कहानी

By gautamjkr1995@gmail.com
January 9, 2021 7 Min Read
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By Malay Nirav

 हम, तथाकथित सभ्य और श्रेष्ठ इन्सान, पंछी की तरह खुले आसमान में मुक्त उड़ना चाहते हैं लेकिन क्या हम इन पक्षियों की तरह मरना चाहेंगे? आप सोच रहे होंगे कि मैं यह बेतुका-सा सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ? शायद आप जानते हों या न भी जानते हों लेकिन क्या यह जान लेने के बाद भी आप गर्व से कह पाएंगे कि आपके पास इंसानियत है! 

Photo credit: Scroll.in


नववर्ष में मानवता की कहानी कुछ ऐसी है। केरल में बर्ड फ्लू के एच5एन8 स्वरुप के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए बत्तखों व मुर्गे-मुर्गियों समेत 69 हजार से अधिक पक्षियों को मारा गया है। आप सोच रहे होंगे कि इसमें गलत क्या है? संक्रमण को इन्सान और पक्षियों में फैलने से रोकने के लिए यह तरीका लगभग दशकों से अपनाया जा रहा है लेकिन इंसानियत को मार कर हम किस तरह इन्सान को बचा रहे हैं! शायद अब भी आप सोच रहे होंगे इसमें गलत तो कुछ भी नहीं है। दुर्भाग्यवश अभी हमारी मानवता कोरोना महामारी से संक्रमित है। यह महामारी भी एक इन्सान से दूसरे इन्सान में संक्रमण से फैलता है लेकिन क्या हम इन्सान को संक्रमण से बचाने के लिए संक्रमित या संदेहास्पद व्यक्ति की जान ले रहे हैं? हो सकता है कि आपको यह तुलना बे सिर-पैर की लगे लेकिन क्या हम इस घटना पर गर्व कर सकते हैं?

विकास वह नहीं जो जंगल काटना सिखाए, विकास तो वह है जो मरुस्थल को हरा-भरा करना बताए। विकास के स्वार्थी-समझ की ही देन है “जलवायु परिवर्तन” और नित्य नई आने वाली “बीमारी-महामारी”। मानवता की कहानी का अगला पड़ाव कुछ ऐसा है, केरल सरकार ने पक्षियों को मारने से किसानों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा देने की घोषणा की है। मुआवजे का गणित कुछ ऐसा है; दो महीने से अधिक आयु के मारे गए हर पक्षी के लिए 200 रुपए और दो महीने से कम आयु के पक्षियों के लिए 100-100 रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। जिन अंडों को नष्ट किया गया है, उनके लिए प्रति अंडा पाँच रुपए मुआवजा दिया जाएगा। मानते हैं कि इससे किसान रुपी इन्सान को हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है लेकिन इंसानियत को हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? शायद इसी वजह से मुझे कभी-कभार गणित संवेदनहीन महसूस होता है, ना-ना इन्सान नहीं! क्या उन तथाकथित बेजुबां पक्षी (मैं उनको बेजुबां कहने से परहेज करता हूँ क्योंकि मैं खुद को, उनकी भाषा नहीं समझ पाने की वजह से, अनपढ़ मानना बेहतर समझता हूँ) के जान की कोई कीमत नहीं है? उनको मुआवजा कौन, कैसे और कितना देगा?


आखिर बर्ड फ्लू क्या होता है? इसका अतीत, वर्तमान और भविष्य क्या है? 

शायद आप इन सवालों का जवाब जानते हों, फ़िर भी मैं ढीठतावश थोड़ी-बहुत ज्ञात जानकारी दे ही देता हूँ। अतीत-वर्तमान-भविष्य से कुछ याद आया है। पहले वही आपको बता देता हूँ। थोड़ा-सा रोचक है। अतीत में (30 सितम्बर 2020) भारत सरकार ने खुद को इस बीमारी से मुक्त घोषित किया था। बहरहाल वर्तमान समय में देश में बर्ड फ्लू का आ- धमकना देखकर इसका भविष्य सुनहरा जान पड़ रहा है।

बर्ड फ्लू जिसे एवियन इंफ्लूएंजा भी कहा जाता है, बेहद संक्रामक और घातक है। इंफ्लूएंजा के 11  वायरस हैं जो इंसानों को संक्रमित करते हैं। लेकिन इनमें से सिर्फ पांच ऐसे हैं जो इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। ये हैं- H5N1, H7N3, H7N7, H7N9 और H9N2।  बर्ड फ्लू पक्षियों के जरिए ही इंसानों और अन्य जानवरों में फैलता है। इन वायरसों को HPAI (Highly Pathogenic Avian Influenza) कहा जाता है। इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक है- H5N1 बर्ड फ्लू वायरस। यह मुख्य तौर पर पोल्ट्री फार्म में पलने वाली मुर्गियों से फैलना शुरू होता है। 

WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जीवित या मरे हुए संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने से ये बीमारी हो सकती है। इंसान से इंसान में ये बहुत आसानी से नहीं फैलता है। यहां तक कि इस बात के भी साक्ष्य नहीं हैं कि पके हुए पोल्ट्री फूड से किसी इंसान को बर्ड फ्लू हो सकता है। ये वायरस ताप के प्रति संवेदनशील है और कुकिंग टेंपरेचर में नष्ट हो जाता है। बर्ड फ्लू की बीमारी पक्षियों के मल, लार, नाक-मुंह या आंख से स्राव के माध्यम से इंसानों में फैल सकती है। H5N1 से संक्रमित पक्षी लगभग 10 दिनों तक मल या लार के जरिए वायरस रिलीज करता है। H5N1 वायरस माइग्रेटरी पक्षियों के जरिए भी फैलता है। जैसे बत्तख, गीस, स्वान। ये हजारों किलोमीटर उड़कर प्रजनन के लिए आती-जाती हैं। इनमें से अगर एक भी पक्षी बर्ड फ्लू से संक्रमित है तो यह जिस देश में पहुंचती है वहां पर संक्रमण फैला देती है। इनके संपर्क में आने वाले अन्य पक्षी भी संक्रमित हो जाते हैं। इसके बाद यह पोल्ट्री फार्म और फिर इंसानों तक पहुंच जाता है। WHO के मुताबिक H5N1 बर्ड फ्लू वायरस किसी सतह के जरिए भी इंसानों को संक्रमित कर सकता है। इससे बचने के लिए पोल्ट्री फार्म में काम करने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए। प्रभावित इलाकों में जाने से और संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए। इसके अलावा, अधपका या कच्चा मांस या अंडा खाने से भी बर्ड फ्लू का शिकार हो सकते हैं। संक्रमित रोगियों की जांच या देखभाल करने वाले हेल्थकेयर वर्कर्स के नजदीक जाने से भी बचना चाहिए। घर में किसी संक्रमित व्यक्ति से भी निश्चित दूरी बनाकर रखनी चाहिए। ओपन एयर मार्केट में जाने से परहेज करना चाहिए और हाइजीन-हैंडवॉश जैसी बातों का भी खास ख्याल रखना चाहिए। बर्ड फ्लू के लक्षण आमतौर पर होने वाले फ्लू के लक्षणों से काफी मिलते-जुलते हैं। H5N1 इंफेक्शन की चपेट में आने पर खांसी, डायरिया, रेस्पिरेटरी में परेशानी, बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, बेचैनी, नाक बहना या गले में खराश की समस्या हो सकती है।

बर्ड फ्लू अब तक दुनिया में चार बार बड़े पैमाने पर फैल चुका है। यहां तक कि 60 से ज्यादा देशों में महामारी का रूप भी ले चुका है। साल 2003 से लेकर अब तक लगातार यह किसी न किसी देश में अपना असर दिखाता रहता है। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस इन सभी वायरसों में सबसे ज्यादा खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसकी वजह से संक्रमित लोगों में से आधे से ज्यादा की मौत हो जाती है।

साल 2003 से लेकर अब तक H5N1 बर्ड फ्लू वायरस से संक्रमित इंसानों और मौत की बात करें तो कुल 861 लोग संक्रमित हुए हैं और इनमें से 455 मारे जा चुके हैं। यानी मृत्यु दर 52.8 फीसदी है। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस ज्यादातर दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है हालांकि इस वायरस ने दुनिया के लगभग सभी देशों को संक्रमित किया है। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस ने साल 2008 में चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और वियतनाम में संक्रमण फैलाया था। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस के कुछ वैक्सीन भी बने हैं, जिन्हें ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा जैसे देशों ने अपने पास जमा करके रखा है। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस के साथ एक सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इसका वायरस हवा से फैलता है। साथ ही तेजी से म्यूटेशन भी करता है। इंसानों से इंसानों में इसके संक्रमण के मामले कम देखे गए हैं लेकिन पक्षियों और जानवरों के जरिए इंसानों में इसका संक्रमण जरूर फैला है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल 2008 में फैले H5N1 बर्ड फ्लू वायरस की वजह से कुल संक्रमित लोगों में से 60 फीसदी लोगों की मौत हुई थी।


चीन के गुआंगडोंग से शुरू हुआ संक्रमण

H5N1 बर्ड फ्लू वायरस ने सबसे पहले 1959 में स्कॉटलैंड में मुर्गियों को मारा था। इसके बाद इंग्लैंड में (1991 में) टर्की पक्षी को मारा था, लेकिन तब तक यह इंसानों में नहीं फैला था। इंसानों को H5N1 बर्ड फ्लू वायरस ने पहली बार 1997 में संक्रमित किया। ये मामला था चीन के गुआंगडोंग का। इसके बाद हॉन्गकॉन्ग में 18 लोग इससे संक्रमित हुए। इनमें से 6 लोगों की मौत हो गई थी। ये पहली बार था जब H5N1 बर्ड फ्लू वायरस की वजह से इंसानों की मौत हुई। H5N1 बर्ड फ्लू वायरस के दो स्ट्रेन हैं। पहला नॉर्थ अमेरिकन यानी Low pathogenic avian influenza H5N1 (LPAI H5N1) और दूसरा एशियन लीनिएज Asian lineage HPAI A(H5N1)। एशियन लीनिएज ज्यादा खतरनाक है। नॉर्थ अमेरिकन H5N1 बर्ड फ्लू वायरस 1966 से लेकर अब तक 8 बार म्यूटेशन कर चुका है। जबकि, एशियन लीनिएज की वैज्ञानिक अब तक गिनती भी नहीं कर पाए हैं।

अब फ़िर से वापस आते हैं मानवता की कहानी पर आप लोग शायद “विरुद्धों का सामंजस्य”  सिद्धांत से परिचित हों। साहित्य में इसका प्रतिपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया था। खबरों में भी “विरुद्धों का सामंजस्य” सिद्धांत का प्रयोग हो सकता है, इसका एहसास मुझे कुछ दिन पहले ही हुआ। एक ही पृष्ठ पर दो विरोधाभासी खबरें थीं। एक खबर थी, बर्ड फ्लू के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में और उसके आसपास एक किलोमीटर के दायरे में बत्तख, मुर्गियों और अन्य घरेलू पक्षियों को मारने का आदेश दिया। वहीं दूसरी खबर थी, पशु क्रूरता निरोधक कानून 1960 के तहत अधिसूचित पशु क्रूरता निरोधक ( केस प्रॉपर्टी की देखरेख व रखरखाव ) नियम 2017 से संबंधित।यह पढ़कर घोर आश्चर्य हुआ कि एक तरफ़ तो देश में पशु से क्रूरतापूर्ण व्यवहार न हो इसके लिए कठोर कानून है, वहीं दूसरी ओर सरकार ही कानून की आत्मा को तार-तार कर रही है। खबर का यह सामंजस्य कितना अद्भुत है! अभी शुक्ल जी जीवित होते तो कितना ज्यादा गौरवान्वित होते यह देखकर कि उनका सिद्धांत साहित्य से विस्तृत होकर समाचार और समाज तक पैठ बना लिया है! चरैवेति-चरैवेति मानवता की कहानी! 

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