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Editorialfarmers

किसान, जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है!

By gautamjkr1995@gmail.com
January 10, 2021 5 Min Read
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By Prabhakar

 ” शायद किसानों को ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है इसलिए आज वो सड़कों पर हैं। किसान अपने हक की लड़ाई के लिए ही सड़कों पर आते हैं वरना उन्हें खेती किसानी से कहाँ फुरसत कि आकर कड़ी ठंड में अपनी जान गवाएँ। “


Photo credit: Reuters
“मेरा देश बदल रहा है…” वाकई 2014 से लगातार दूसरी बार भारी जनादेश पर प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने अब तक देश में कई बदलाव और बहुत कुछ नया किया है। कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सात वर्ष से कम समय में देशवासियों को कई बड़े तोहफ़े दिए। इन तोहफ़ों में वे फैसले शामिल थे जो लंबे समय से देश के लिए नासूर बने थे। चाहे वह जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी बनाने का कदम हो, तीन तलाक पर पाबंदी के लिए “मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2019” को लागू करना हो या भाजपा के चुनावी एजेंडे में शामिल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का वादा।

देश में बदलाव दिख रहा है लेकिन क्या इन बड़े-बड़े बदलावों के बीच आम आदमी की ज़िन्दगी में भी कुछ बदलाव आया या उसका जीवन अब भी तमाम संकटों से ही घिरा है? देश में तमाम बड़े विवादों का निपटारा सरहनीय कदम हो सकता है लेकिन क्या इससे आम आदमी की बुनियादी समस्याओं का भी समाधान संभव हुआ है? ये सवाल हैं! ज़रूरी सवाल…क्योंकि एक आम आदमी के लिए अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से मुँह मोड़ना संभव नहीं है।

भारत का आम नागरिक इन दिनों कई मूलभूत संकटों से जूझ रहा है जिसका समाधान समय रहते न किया गया तो देश संकट में आ सकता है। इन्हीं समस्याओं में एक है किसानों-अन्नदाताओं की समस्या। जिसके लिए देश के किसान दिल्ली के कई सीमाओं पर लम्बे समय से आन्दोलनरत हैं। इस आन्दोलन की शुरूआत भारत सरकार द्वारा तीन तथाकथित ऐतिहासिक कृषि कानूनों को लाये जाने पर हुई।

कानून भी उस समय लागू किया गया जब देश कोरोना महामारी जैसे संकट का सामना कर रहा था। ऐसे हालात के बीच आनन-फानन में अध्यादेश लाकर कानून बनाना भी मोदी सरकार के ऊपर सवालिया निशान खड़ा करता है। कोरोना महामारी के बीच तथाकथित काले कानून लाकर कहीं सरकार का मकसद इस बिल के परिणाम स्वरूप होने वाले विरोध और प्रदर्शनों से बचना तो नहीं था?

संविधान का अनुच्छेद 123 कहता है -“यदि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्यवाई करना उसके लिए आवश्यक हो गया है तो वह ऐसे अध्यादेश प्रख्यापित कर सकेगा जो उसे उन परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों”

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020 

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020 में युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों को छोड़कर अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर करना यानी इन खाद्य पदार्थों के भण्डारण की असीमित छूट देना कालाबाजारी जैसा समस्या को बढ़ावा देना है। किसानों के पास भण्डारण की सुविधा न के बराबर ही होती है जिसके कारण आने वाले समय में व्यापारी और व्यवसायी ही इसका अनुचित लाभ उठायेंगे। 

शायद इसके एक पहलू पर ही ध्यान देते हुए, विधेयक पर हुए चर्चा के जवाब में उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री, श्री दानवे रावसाहेब दादाराव ने कहा था भंडारण सुविधाओं में कमी के कारण कृषि उपज की बर्बादी को रोकने के लिए यह संशोधन बहुत आवश्यक है।

मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता कानून, 2020 

इसके तहत सरकार का लक्ष्य है “कृषकों को व्यापारियों, कंपनियों, प्रसंस्करण इकाइयों, निर्यातकों से सीधे जोड़ना और कृषि करार के माध्यम से बुवाई से पूर्व ही किसान को उसकी उपज के दाम निर्धारित करना।“ ऐसे में किसानों का सवाल है कि यदि कॉन्ट्रैक्टर अपने एग्रीमेंट से मुकर जाये या उचित दाम देने से मना कर दे तो वह कहाँ जायेंगे? इतना ही नहीं छोटे किसान संविदा खेती (कांट्रेक्ट फार्मिंग) कैसे कर पाएंगे? क्योंकि प्रायोजक उनसे परहेज कर सकते हैं। ऐसे में सरकार की, किसानों को सीधा व्यपारियों से जोड़कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने की मंशा कहाँ तक जायज है?

किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) कानून, 2020

इसपर सरकार का कहना है कि “यह विधेयक राज्यों की अधिसूचित मंडियों के अतिरिक्त राज्य के भीतर एवं बाहर देश के किसी भी स्थान पर किसानों को अपनी उपज निर्बाध रूप से बेचने के लिए अवसर एवं व्यवस्थाएं प्रदान करेगा” वहीं 2014 में भारतीय खाद्य निगम की प्रचालनात्मक कार्य कुशलता और वित्तीय प्रबंधन में सुधार के लिए शांता कुमार की अध्यक्षता में बनी उच्च स्तरीय समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपी रिपोर्ट में कहा था –

  • भारतीय खाद्य निगम को उन राज्यों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए जहां पर किसान न्यूनतम समर्थन से कम मूल्य पर अपना अनाज बेच रहे हैं।
  • दालों और तिलहनों को प्राथमिकता देने की जरूरत है तथा भारत सरकार को इनके लिए बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाना चाहिए।
  • कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ़ 6 फ़ीसदी किसानों को मिल पाता है। यानी 94 फ़ीसदी किसानों को एमएसपी का लाभ कभी मिला ही नहीं।

क्या इन सिफारिशों को देखकर ये नहीं समझा जा सकता कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को और बेहतर ढंग से लागू किये जाने की ज़रूरत है!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बार-बार दिया जाने वाला यह तर्क कि बीजेपी की सरकार ने कांग्रेस सरकार से तीस गुना ज्यादा अनाज खरीदा है इसलिए एमएसपी को सरकार द्वारा खत्म किये जाने का सवाल ही नहीं उठता। यदि इस तर्क के पीछे की सच्चाई पर नज़र डालें तो पता चलता है पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार द्वारा पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम,2013 में पात्र व्यक्ति चावल/ गेहूं/मोटे अनाज क्रमश: 3/2/1 रूपए प्रति किलोग्राम के राज सहायता प्राप्त मूल्यों पर 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति व्यक्ति प्रति माह प्राप्त करने का हकदार बनाया गया था। ऐसे में मोदी सरकार के लिए एमएसपी पर अधिक अनाज खरीदना मजबूरी थी।

शायद किसानों का यह डर जायज़ है कि भविष्य में सरकार एमएसपी को बंद कर देगी और सब कुछ प्राइवेट घरानों के हाथों में आ जायेगा और किसानों से व्यापारी मनमाने दामों पर फसल/अनाज खरीदते रहेंगे। सरकार के पास अनाज भण्डारण की क्षमता भी अच्छी नहीं है। सरकार को एपीएमसी मंडियों के साथ आधुनिक तकनीक से युक्त अनाज़ भण्डारण की नई व्यवस्था करनी चाहिए ताकि किसानों को मंडियों से रखरखाव की व्यवस्था या बोरों की किल्लत के चलते वापस न लौटना पड़े और सरकारी गोदाम में भारी मात्रा में अनाजों को सड़ने-गलने से भी बचाया जा सके।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट बताती है कि साल 2018 में भारत में 10,349 किसानों और कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की। बड़ा सवाल है कि क्या इन आत्महत्याओं को नये कृषि सुधार कानूनों को लागू करके रोका या कम किया जा सकता है?

शुजा ख़ावर का लिखा एक शेर हैं जो आज की परिस्थिति से काफी मेल खाता है-

“या तो जो ना-फ़हम हैं वो बोलते हैं इन दिनों, या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है”

शायद किसानों को ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है इसलिए आज वो सड़कों पर हैं। किसान अपने हक की लड़ाई के लिए ही सड़कों पर आते हैं वरना उन्हें खेती किसानी से कहाँ फुरसत कि आकर कड़ी ठंड में अपनी जान गवाएँ।

 

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