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कृषि कानूनों पर सुनवाई: सवाल सिर्फ़ निष्पक्षता का नहीं, पितृसत्ता और इस्लामोफ़ोबिया का भी है!

By gautamjkr1995@gmail.com
January 13, 2021 5 Min Read
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By Gautam Kumar

कृषि कानूनों से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को समझने से पहले हमें यह भी जान लेना चाहिए कि न्यायालय में किस मामले की सुनवाई हुई। तीन तरह के लोगों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है। पहले वो जो इन कृषि कानूनों के समर्थक हैं, दूसरे वो जो कानून के संवैधानिकता को चुनौती दे रहे और तीसरे वो जो किसानों को उनके धरना स्थल से हटाने की बात कर रहे हैं। न ही आंदोलन कर रहे किसान कोर्ट गए, और न ही सरकार। अब चलते हैं पारित आदेश की तरफ।




सर्वोच्च न्यायालय ने कृषि कानूनों के लागू करने पर स्थगन आदेश दिया है। इसके साथ ही कृषि कानूनों की समीक्षा के लिए चार सदस्यीय समिति का भी गठन किया गया। सुनवाई के दौरान गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर रैली को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने किसान संगठनों को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी स्थगन आदेश अस्थायी है और नया आदेश जारी होने तक मान्य है। गठित समिति 2 महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपेगी, फिर कृषि कानूनों पर एक नया आदेश जारी किया जा सकता है।


 

न्यायालय किसी भी समिति का गठन कब और क्यों करती है या किसी विशेषज्ञ से परामर्श क्यों लेती है?


फैज़ान मुस्तफा, NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति हैं। फैज़ान मुस्तफा बताते हैं कि निचली अदालतों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872 के धारा 45 के तहत किसी विशेष क्षेत्र के विशेषज्ञों को ऐसा साक्ष्य देने के लिए बुलाया जाता है जिसकी विशेषज्ञता न्यायाधीशों के पास नहीं होती। सर्वोच्च न्यायालय में साक्ष्य दर्ज नहीं होते। कृषि कानूनों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका इन कानूनों की संवैधानिकता जांच करने के लिए महत्वपूर्ण है जिसके लिए किसी भी समिति का गठन करने की जरूरत नहीं, वह ख़ुद काफी है। हालाँकि कई बार अदालतें समितियों का गठन करती हैं लेकिन वे मामले अलग होते हैं। यहाँ सवाल यह है कि कानून अच्छे हैं या बुरे, जो कि उच्चतम न्यायालय के दायरे से बाहर की चीज़ है। यह सरकार और जनता के बीच की बहस है। यह बात उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से कही।


ज़ाहिर है सर्वोच्च न्यायालय कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों से परामर्श करके एक राय बनाना चाहता है मगर समिति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना न्यायालय की ज़िम्मेदारी है। अब इस देश का सर्वोच्च न्यायालय अपनी ज़िम्मेदारी कैसे निभाता है, यह हम सब को देखना है।


समिति के चारों सदस्य- भूपेंद्र सिंह मान (भारतीय किसान यूनियन), डॉ. प्रमोद कुमार जोशी (कृषि विशेषज्ञ), अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ) और अनिल घनावंत (शेतकारी संगठन) सार्वजनिक तौर पर कभी न कभी समाचार पत्रों में लेख या अन्य माध्यमों से इन कृषि कानूनों का समर्थन करते रहे हैं इसीलिए इस समिति के रिपोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होना लाज़मी है। सवाल सर्वोच्च न्यायालय पर भी खड़े हो रहे हैं कि इन सदस्यों का चुनाव कब, कैसे और क्यों हुआ?


बहरहाल किसान नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी समिति का हिस्सा नहीं बनेंगे और अपना प्रदर्शन जारी रखेंगे।


क्या पूरी न्यायिक प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की नैतिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है!


जिस देश में तकरीबन 10 करोड़ महिलाएं (2011 Census) किसानी पर निर्भर हैं, उस देश के मुख्य न्यायाधीश चाहते हैं कि औरतें किसान आंदोलन के धरना स्थल को छोड़ अपने घर चली जायें। 11 जनवरी को हो रही सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े ने स्वयं यह बात कही।

CJI to Phoolka @hsphoolka : I want to take a risk. I want you to tell them that the Chief Justice of India wants them (old people and women) to go back. Try persuade them.#FarmersProtests #FarmLaws#SupremeCourt

— Live Law (@LiveLawIndia) January 11, 2021


सुनवाई के दौरान बच्चों और बूढ़ों के लिए भी उनकी यही चिंता रही। आख़िर आंदोलनरत जवान मर्दों को क्यों छोड़ दिया गया? मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े के इस बायन को महिलाओं, बच्चों और वृद्ध लोगों के साथ बरती जाने वाली संवेदना (चिंता) कही जाये? या इस कथित संवेदनशीलता (चिंता) को पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम! बहस का एक पहलू यह भी होना चाहिए।


इसी संदर्भ में यूथ फ़ॉर स्वराज नामक एक संस्था ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के नाम एक खुला ख़त भी लिखा है ताकि सर्वोच्च न्यायालय किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका स्वीकारे।


Women are not supporters but the participants and leaders of the historic Kisan Andolan.

Open Letter to honourable CJI on recognition of Women Farmers and their right to protest. Register to be a signatory to this letter –https://t.co/i0faR36v4z #MahilaKisan #SupremeCourt pic.twitter.com/Ju3BaMCPqo

— Youth For Swaraj (@Youth4Swaraj) January 13, 2021


12 जनवरी की सुनवाई में बहस के दौरान एपी सिंह, जो कि भारतीय किसान यूनियन (भानु) के लिए पेशी दे रहे थे, उन्होंने कहा कि शाहीनबाग़ में हुए आंदोलन और किसान आंदोलन की तुलना नहीं की सकती क्योंकि किसान देशभक्ति के साथ आंदोलन कर रहे हैं। आख़िर उनके इस बयान का क्या अर्थ हो सकता है?


AP Singh for BKU-Bhanu – There is no comparison between the farmers protests and Shaheen Bagh protests. Farmers are protesting in a patriotic way. We have suggested names of Justices Kurian Joseph and Markandeya Katju @mkatju for the Committee.

— Live Law (@LiveLawIndia) January 12, 2021


एपी सिंह अप्रत्यक्ष रूप से क्या बताना चाह रहे थे? क्या यही कि शाहीनबाग़ में जो आंदोलन कर रहे थे वो देशभक्त नहीं थे या उनमें कम देशभक्ती थी? मुख्य न्यायाधीश की संवेदना (चिंता) के क्या मायने थे? क्या यही कि औरतें वापस चली जाएं और घर संभाले, लड़ाई उनके घर के मर्द लड़ लेंगे?


हो सकता ऐसा न हो, या हो सकता है इससे भी घातक मायने हों। मगर इस पूरे न्यायिक प्रक्रिया में अगर ऐसी घटनाएँ हुईं, तो क्या ऐसे सवाल खड़े नहीं होने चाहिए? और इस पर तो सबकी नज़र थी, सभी मामलों पर तो सबकी नज़र नहीं होती। तब कैसा होता होगा! यह तो सबके सामने घटित हुआ, पीछे क्या होता होगा? ख़ैर


जिसे जनता न्याय का मंदिर कहती हो और पूरी उम्मीद भरी नज़रों से देखती हो, वहाँ के देवता सरेआम पितृसत्ता और इस्लामोफोबिया को प्रश्रय दें तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। समता मूलक समाज के निर्माण में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के समक्ष सर्वोच्च न्यायालय कैसा उदाहरण पेश कर रहा है? ऐसी समस्यायों से हम लोगों का सामना बार-बार होता है। मगर आत्म बोध के पश्चात भी अगर हम उसे नहीं स्वीकारते तो निश्चित ही हम पितृसत्ता और इस्लामोफोबिया के पैरोकार हैं।

अपनी कमियों को सबके सामने कबूलने का साहस हर किसी में नहीं होता। बेहतर होगा कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसी घटनाओं का संज्ञान ले और दुनिया का सबसे शक्तिशाली न्यायालय होने का परिचय दे।

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gautamjkr1995@gmail.com

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