मौलिक अधिकार और हमारी प्राइवेसी (भाग 1): वाट्सऐप को हमारी निजता का कितना ख्याल!
By Malay Nirav & Pooja Kumari
आपकी निजता का न होना ही आधुनिक होना है! आज कल यह सवाल गौण होता जा रहा है कि क्या ईश्वर होते हैं ? आज प्रमुख प्रश्न यह है कि आपकी निजता आपकी है या वह सार्वजनिक हो चुकी है। निजता कोरी कल्पना है या वास्तविकता, अब यह सवाल जेहन में रोमांच पैदा करता है। इसके साथ ही कुछ और सवाल भी सिर उठाकर चले आते हैं जैसे, कहाँ तक निजता का मौलिक अधिकार प्रासंगिक है या जीवन में निजता क्यों आवश्यक है या निजता-विहीन जीवन कैसा होगा या फ़िर निजता किस चिड़िया का नाम है?
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| Photo credit: Media India Group |
- न्यायालय ने कहा है कि दरअसल इस मामले की सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल का कहना था कि निजता एक इलीट अवधारणा है, यानी प्राइवेसी खाते-पीते घरों की बात है और निजता का विचार बहुसंख्यक समाज की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता। लेकिन संविधान के पहरेदार उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ज़रूरतमंद लोगों को बस आर्थिक तरक्की चाहिए, नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार नहीं, यह कहना उचित नहीं है।
- शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में कहा है कि जीने का अधिकार, निजता का अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार, को अलग-अलग करके नहीं बल्कि एक समग्र रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय के शब्दों में, “निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग है और यह सही है कि संविधान में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन निजता का अधिकार वह अधिकार है, जिसे संविधान में गढ़ा नहीं गया बल्कि मान्यता दी है।”
- संविधान निजता के अधिकार को संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक बाईप्रोडक्ट है। निजता का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के साहचर्य में लोकतंत्र को मज़बूत बनाएगा।
- किसी का अकेले रहने का अधिकार भी निजता के तहत आएगा। निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्तता की सुरक्षा करता है और जीवन के सभी अहम पहलुओं को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देता है।
- न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता।
- अन्य मूल अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार में भी युक्तियुक्त निर्बंधन की व्यवस्था लागू रहेगी, लेकिन निजता का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को उचित और तर्कसंगत होना चाहिए।
- न्यायालय ने यह भी कहा है कि निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैर-सरकारी तत्त्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता है। अतः सरकार डेटा संरक्षण का पर्याप्त प्रयास करे।
- न्यायालय ने सूक्ष्मता से अवलोकन करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है। अतः ऐसी सूचनाएँ कहाँ रखी जाएंगी, उनकी शर्तें क्या होंगी, किसी प्रकार की चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी? इन पहलुओं पर गौर करते हुए कानून बनाया जाना चाहिए।
भवन की नींव पड़ जाना, फ़िर उसका बन जाना ही काफी नहीं होता है, बल्कि उसमें रहने वालों को समय-समय पर उसकी साफ़-सफ़ाई भी करनी होती है। ठीक वैसे ही निजता को मौलिक अधिकार में शामिल कर लिया जाना ही काफी नहीं है, बल्कि इसे आम जीवन में क्रियान्वित भी होना चाहिए।
( मौलिक अधिकार और हमारी प्राइवेसी श्रृंखला का दूसरा भाग 2 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें )
