Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Impractical Media

Not for Sale

Impractical Media

Not for Sale

  • Home
  • About us
  • Home
  • About us
Subscribe
Close

Search

art & culturefeature

सत्य का शोधक:अशोक कुमार पांडेय

By gautamjkr1995@gmail.com
January 6, 2021 4 Min Read
0

By Malay Nirav

 देश में लोकतंत्र है, यह दो किताब (एक “उसने गाँधी को क्यों मारा”,दूसरा “गाँधी वध क्यों?”) एक साथ किसी दुकान में रखा देख कर आपको महसूस हो सकता है। हालाँकि लोकतंत्र परिपक्व है या अपरिपक्व इसका आकलन हर दिन होते रहना चाहिए।


Ashok Kumar Pandey (Via Twitter)


                          ‘उसने गाँधी को क्यों मारा'(लेखक-अशोक कुमार पांडेय) पुस्तक को पढ़ते समय आप वॉट्सएप्प यूनिवर्सिटी द्वारा गाँधी-नेहरु-पटेल-कश्मीर के बारे में फैलाये गए भ्रम-झूठ को परत-दर-परत उघड़ते महसूस कर सकते हैं। “….इतिहास को भ्रष्ट करने वाले दौर में एक बौद्घिक सत्याग्रह।” यह पंक्ति आपको किताब के पिछले कवर पृष्ठ पर लिखी दिखेगी। अगर एक पंक्ति में इस किताब की व्याख्या करनी हो तो यह पूर्णतः सटीक है।

                            सरल,सहज गाँधी वाली हिन्दुस्तानी भाषा में लिखी यह किताब आपको कहीं भी भाषा के स्तर पर रुकावट नहीं डालती है। ऐसे दौर में जब आम नागरिक की किताब से दूरी बढ़ती जा रही है, वे फास्टफूड की तरह फास्ट-ज्ञान की खोज और उसकी स्वीकृति में मसगुल हैं तब यह पुस्तक आपको अपनी तरफ़ आकर्षित करने के साथ-साथ पढ़ने को भी विवश करती है। पुस्तक की शीर्षक भी कौतूहल जगाती है, “उसने गाँधी को क्यों मारा।” मन में बार-बार यह विचार कौंधती है, क्यों उस कातिल-हत्यारा या आतंकवादी का नाम शीर्षक में नहीं रखा गया है? पढ़ने के बाद आप इसके तह में पहुँच सकते हैं। यह पुस्तक बताती है कि गाँधी की हत्या के लिए सिर्फ़ एक शैतान जिम्मेदार नहीं, बल्कि उस जैसे कायर लोगों के एक समूह की पाखंडी विचारधारा जिम्मेदार है। आज भी इस पाखंडी विचारधारा के लोग अपने कुकर्म को करते देखे जाते हैं। इन लोगों के पाखंड को बखुबी से सतह पर लाती है यह पुस्तक।

                         गाँधी सिर्फ़ एक नाम नहीं हैं। वे एक विचार-दर्शन हैं। उनका जीवन चार स्तंभ पर टिका है:सत्य,अहिंसा,सत्याग्रह और स्वराज। उनकी पूरी जिन्दगी ‘सर्व-धर्म-सद्भाव’ की व्याख्या करती है। उनका मानना था कि जो बदलाव आप संसार में देखना चाहते हैं, वह पहले खुद में लायें। उनके लिए यह सिर्फ़ एक कथन भर नहीं था,यह तो उनका यथार्थ है। वे धार्मिक व्यक्ति थे,लेकिन उस धर्म की निंदा करने से चूकते भी नहीं थे जिसमें कमजोर को सताया जाता हो। हिन्दू धर्म में व्याप्त अस्पृश्यता की घोर निंदा करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि ‘अस्पृश्यता के जीवित रहने की तुलना में मैं हिन्दू धर्म का मर जाना पसंद करूँगा’।

                         ‘उसने गाँधी को क्यों मारा’ को पढ़ते समय बार-बार धार्मिक कट्टरपंथ/कट्टरपंथी जैसे शब्द सामने आये हैं। मुझे लगता है कि यहाँ या अन्य जगहों पर जिन संदर्भ में इस शब्द का प्रयोग होता है, वह गलत है। धार्मिक कट्टरपंथी तो वह हुआ जो अपने धर्म के नियमों को कठोरता से पालन करता हो। जैसे हिन्दू धर्म के कुछ नियम हैं:ईश्वर प्राणिधान, संध्या वंदन, श्रावण माह व्रत, तीर्थ चार धाम, दान, मकर संक्रांति-कुंभ पर्व, पंच यज्ञ, सेवा कार्य, 16 संस्कार आदि। धार्मिक कट्टरपंथी इन नियमों के अधीन ही चलता है, लेकिन आजकल जिनके लिए यह शब्द इस्तेमाल होता है वे तो इन नियमों के इर्द-गिर्द भी नहीं भटकते हैं। वे सिर्फ़ विभिन्न धर्म के लोगों के बीच वैमनस्य फैलाते हैं, फ़िर वे कैसे कट्टरपंथी हो सकते हैं ? वे सिर्फ़ “पाखंडी” ही हो सकते हैं। उनको “पाखंडी” ही सम्बोधित करना चाहिए ना कि कट्टरपंथी।

                            इस पुस्तक को पढ़ लेने के बाद कुछ समय तक एक बात मस्तिष्क में बादल की तरह उमड़-घुमड़ कर आती-जाती रही ! हमारे आजादी-आन्दोलन के दो सर्वश्रेष्ठ सुरमा, भगत सिंह और गाँधी,का असमय स्वर्गवास होने की वजह हिन्दू ही हैं। हंसराज बोहरा,जयगोपल और गोडसे ! हिन्दू धर्म पर एक कलंक हैं,धब्बा हैं। हमारे गुनहगार हैं। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि अगर ये मुस्लिम धर्म के होते फ़िर क्या होता ?

                         वैसे तो इस पुस्तक में आकर्षण के अनेको केंद्र हैं, लेकिन दो प्रसंगों ने हमारे मन-मस्तिष्क में हलचल मचाई है । एक – कपूर आयोग के संदर्भ में आपराधिक मुकदमे और जाँच आयोग के अंतर को स्पष्ट करता हुआ प्रसंग, दूसरा – गाँधी के उपवास और भूख-हड़ताल के दर्शन को व्यक्त करने वाला प्रसंग। इस प्रसंग को पढ़ते समय हमें महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का गांधी जी के लिए कहा कथन बार-बार याद आ रहा था, “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था ।” हालांकि ‘कपूर आयोग’ की रिपोर्ट का भी अन्य सरकारी रिपोर्ट की तरह फाइलों में कैद होकर रह जाना दिल को कचोट जाती है।

                           “उसने गाँधी को क्यों मारा” पढ़कर मैंने यह महसूस किया कि यह पुस्तक न केवल आज के समय में बार-बार पूछे जाने वाले मिथ्या प्रश्नों का जवाब देती है, बल्कि आपको पलटकर उन जमीर विहीन इन्सान से प्रश्न पूछने का मार्ग भी प्रशस्त करती है। यह पुस्तक तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक गोडसे जैसे रीढ़विहीन लोग हिन्दुस्तान में रहेंगे।…

 

Author

gautamjkr1995@gmail.com

Follow Me
Other Articles
Previous

किसान आन्दोलन : इतिहास और वर्तमान

Next

The nationalistic claim of the World’s Largest Vaccination Program is going to take us nowhere

No Comment! Be the first one.

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • जलते हुए दृश्यों से आती रौशनी
  • भारतीय बाजार और हिंदी भाषा
  • ना…ना…ना…सुनना-पढ़ना-सुनाना
  • घो घो रानी कितना पानी? इतना पानी.. इतना पानी
  • प्रेमचंद का आना…

Recent Comments

No comments to show.
Copyright 2026 — Impractical Media.