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क्या दिल्ली हिंसा राज्य प्रायोजित थी?

By gautamjkr1995@gmail.com
March 12, 2020 4 Min Read
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By Sachin Baghel

“सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सुनवाई तय तब करेंगे जब हिंसा बंद करोगे । यह अपने आप में हास्यास्पद था। यही सुप्रीम कोर्ट ने मंडल कमीशन के लागू होने के बाद हिंसा को देखकर आरक्षण के लागू होने पर तत्काल रोक लगा दी थी।”
जिस तरह दिल्ली दंगों में पुलिस न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका रही है वह इस सन्देह को और मजबूती प्रदान करता है कि यह हिंसा राज्य प्रायोजित थी। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार अब तक दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत 300 से अधिक घायल और 2400 से अधिक लोगों को गिरफ्तार या नजरबंद किया जा चुका है। दिल्ली दंगों में अब तक 25000 करोड की संपत्ति का नुकसान हुआ है। क्या यह हिंसा हिंदू मुस्लिम के बीच की हिंसा थी? क्या सरकार रोक नहीं सकती थी या यह हिंसा राज्य बनाम मुस्लिम समुदाय के के बीच के हिंसा  थी ? राज्य बनाम मुस्लिम समुदाय के नजरिए नजर से देखने पर ऐसे कई संकेत मिलते हैं जो इस धारणा को प्रमाणिकता प्रदान करते नजर आते हैं की यह राज्य बनाम मुस्लिम हिंसा ही है।
A vandalized house in North-East Delhi

पुलिस की भूमिका 

दिसंबर से राजधानी में घटित घटनाओं में दिल्ली पुलिस के व्यवहार का परीक्षण करें तो कई संकेत समझे जा सकते हैं। पहले  15 दिसंबर को जामिया विश्वविद्यालय में हुई हिंसा के सीसीटीवी फुटेज यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पुलिस छात्रों को काबू करने के लिए नहीं वरन पीटने के लिए उतावली थी। बिना अनुमति विश्वविद्यालय में प्रवेश पर उसके पास ठोस जवाब नहीं था । पहले दिल्ली पुलिस यह मानने से साफ इंकार करती रही कि उसने कोई गोली चलाई बाद में मीडिया द्वारा वीडियो में दिखाने के बाद दिल्ली पुलिस ने स्वीकारा कि उसने गोली चलाई थी। इस हिंसा की बर्बरता का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक छात्र की आंख खराब हो गई और 10 से ज्यादा छात्रों की हालत गंभीर थी । 
उसके बाद 5 जनवरी को जेएनयू हिंसा में जिस तरह पुलिस गेट के बाहर खड़ी ताकती रही और बाद में फोटो और वीडियो आने पर भी आज तक एक गिरफ्तारी नहीं हुई। यह पुलिस के झुकाव को साफ दर्शाता है। उत्तर प्रदेश में 1920 दिसंबर को अलीगढ़ लखनऊ समेंत जो हिंसा हुई उसके बाद राज्य सरकार जिस प्रकार खुलकर एक समुदाय विशेष को निशाने पर लेती रही है वह बताता है कि जब सरकार हिंसा पर उतारू हो तो किसी समुदाय का बचना कितना मुश्किल होता है।जबकि सारे विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्वक हो रहे थे।

मीडिया की भूमिका

मीडिया और सत्ता पार्टी ने जिस तरह सी ए ए के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को सांप्रदायिक रंग दिया उसने लोगों के दिलों में एक दूसरे के खिलाफ जहर भर दिया । उसने पहले उन्हें अराजक फिर विद्रोही ,उपद्रवी, दंगाई और रुपए के लालच में बिकाऊ आदि तक की संज्ञा दी।  मेंस्ट्रीम मीडिया ने जिस तरह सरजील इमाम और अमानतुल्लाह खान को मिडिया ट्राइल से आतंकवादी करार दिया । उसने समाज के बढे हिस्से को  इस आंदोलन से और दूर कर दिया । और वहीं दूसरी तरफ मीडिया ने सत्ताधारी नेताओं के भड़कीले भाषणों पर चुप्पी साध ली।

न्यायपालिका की भूमिका 

बहुत दिनों के बाद ऐसा दौर आया जब न्यायपालिका संदेह के घेरे में है। जब-जब सरकार अत्यधिक मजबूत रही है चाहे मोदी हो या इंद्रा सरकार । कोर्ट पर भी उसका असर पड़ा ही है । इस कानून के खिलाफ याचिका दायर करने वालों के साथ कोर्ट ने जो उदासीन रवैया अपनाया है वह रेखांकित करने योग्य है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सुनवाई तय तब करेंगे जब हिंसा बंद करोगे । यह अपने आप में हास्यास्पद था। यही सुप्रीम कोर्ट ने मंडल कमीशन के लागू होने के बाद हिंसा को देखकर आरक्षण के लागू होने पर तत्काल रोक लगा दी थी। उसके बाद जिस तरह चंद्रशेखर आजाद को जमानत दी गई। वह जमानत काम सशर्त जेल ही थी । 
आज तक कोर्ट ने इतनी मौतों की होने के बाद भी स्वत संज्ञान लेकर केंद्र सरकार से जवाब तलब तक नहीं किया। दिल्ली हिंसा के बाद जिस तरह सामाजिक कार्यकर्ता और आजाद विचार रखने वालों को कोर्ट ने नोटिस भेजा और भड़काऊ भाषण वालों को 1 महीने का समय दिया गया। वह बहुत कुछ बताता है। हालांकि  सुप्रीम कोर्ट ने समय कम करने को जरूर कहा परंतु जिस तरह हर्ष मंदर को सुनने से पहले शर्त रखी वह बताता है कि कोर्ट में खुद की आलोचना सहने की शक्ति तक नहीं है।
डॉ कफील खान पर NSA लगा , सरजील इमाम को गिरफ्तार कर लिया गया और ताहिर हुसैन को पार्टी से निकाल दिया गया । उन पर हत्या का मामला के साथ ईडी की भी जांच हो रही है परंतु वहीं दूसरी ओर चाहे अनुराग ठाकुर कपिल मिश्रा प्रवेश वर्मा या अभय वर्मा हों,  आज भी रैलियों में भड़काऊ नारे लगा रहे हैं। जब दिल्ली जल रही थी प्रधानमंत्री मेहमान नवाजी में व्यस्त थे । दंगों के 73 घंटे के बाद प्रधानमंत्री का शांति की अपील का पहला ट्वीट आया जबकि वह क्रिकेटर के अंगूठे को ठीक होने के लिए सेलिब्रिटीज की शादी पर बधाई देने के लिए तत्काल ट्वीट करते हैं । लेकिन लोगों की मौत पर ट्वीट करने के उन्हें 73 घंटे लगे। क्या यह अपने आप में पर्याप्त इशारा नहीं है कि सरकार मूकदर्शक बन इन दंगों को मौन सहमति प्रदान कर रही थी?
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