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प्रेमचंद का आना…

By gautamjkr1995@gmail.com
August 27, 2025 3 Min Read
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लेखक मलय नीरव

By Malay Nirav 

वाराणसी के लमही गांव में जन्म लेने वाले प्रेमचंद को उनकी जयंती पर पूरे देश दुनिया के साहित्यकारों ने याद किया और उनके बारे में लिखा भी। मेरी दृष्टि में हर विद्यार्थी के जीवन में प्रेमचंद आते हैं, कभी हीरा-मोती के माध्यम से तो कभी नमक का दरोगा और ईदगाह के माध्यम से। न चाहते भी आते हैं हमारे सामने, कभी सवाल बन कि आखिरकार गोदान क्यूँ जरूरी है तो कभी कफ़न बन।


मेरे जीवन में कब आए थे प्रेमचंद ? टूटी-बिखरी यादों के सहारे पहुंच रहा हूँ हीरा मोती के पास। दो बैलों की कथा। कहानी क्या थी…दोस्ती की, इंसानों और जानवरों की, जानवरों की जानवरों से। दर्द, संवेदना, एहसास, भावना, अपनापन ये सब शब्द इंसानों के इज़ाद किए हुए हैं लेकिन जानवर भी इनसे अछूते नहीं हैं। इस कहानी को पढ़कर तब एक समझ विकसित होनी शुरू हो गई थी कि चोट किसी को भी नहीं पहुंचानी चाहिए, दर्द हर किसी को होता है। प्रेमचंद तब मेरे बालमन में इस तरह का घुसपैठ कर रहे थे। अनजाने, अनचाहे मुझमें संस्कार के बीज रोप रहे थे।


प्रेमचंद का यह घुसपैठ, मानसिक अतिक्रमण यहीं नहीं रूकता है। वह आते-जाते हैं, नए-नए रंग-ढंग में। अब कि बार का आना ईमानदारी को लाना था। नमक का दरोगा। हम बढ़ते हैं, थोड़े बड़े होते हैं, आसपास की चीजें आकर्षित करती हैं, खरीदने के लिए मन ललचाता है, जो पास दिखता है, जहां पहुँचना आसान लगता है वहाँ चले आते हैं, खूंटी में टंगा पापा की कमीज हो या चादर के नीचे रखकर मम्मी द्वारा भुला दिया गया रुपया हो, जो हाथ में आए…सीधे दुकान में ही जाकर वह हाथ खुलता था। हम इसमें मस्त-मगन हो ही रहे थे कि नमक का दरोगा आ गया। ईमानदारी। दुकान तो अब भी उसी तरह जा रहे थे लेकिन फ्रायडीय अवचेतन में कहीं वह नमक का दरोगा आ बैठा था !


चलिए समझे कि हम तक प्रेमचंद की पहुँच हमारी खुलती हुई आँखों के साथ ही हो गई थी। लेकिन प्रेमचंद को कौन गढ़ रहा था, जैसे वे हमें बुन रहे थे। कौन था वह जिसे नवाबराय पढ़ बड़े हो रहे थे। इतने बड़े हो रहे थे कि एक सदी के बाद भी वह हमारे बड़े होने को नियंत्रित कर रहे थे। कौन थे वे..!
प्रेमचंद वह खिड़की हैं जिनके माध्यम से हम सब हिन्दी साहित्य में झांकना प्रारम्भ करते हैं। अगर यह कहें कि कहानी हो या उपन्यास पहली बार उनके माध्यम से ही हम इन विधाओं से परिचित होते हैं तो यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।

प्रेमचंद को समर्पित डाक टिकट


पहला उपन्यास जो मैंने पढ़ा था वह गोदान था। प्रेमचंद का आखिरी उपन्यास मेरा इस विधा में प्रवेश करने का द्वार बना था। हालांकि गोदान नाम से परिचित बहुत पहले हो गया था लेकिन इसे पढ़ना तब शुरू किया था जब स्नातक के पाठ्यक्रम में यह आया था। महाकाव्यात्मक उपन्यास, भारतीय ग्रामीण-किसान जीवन का महाआख्यान आदि, अनेक उपमाओं से सज-धज कर बार-बार यह सामने आ रहा था। मोटी किताब जिसे उठाने से हिचक रहा था, लेकिन परीक्षा के तनाव में आखिरकार इसे पढ़ना शुरू कर ही दिया था। धीरे-धीरे पेज दर पेज। पन्ने उलटते-पुलटते एक गाँव, जीता जागता गाँव उभरता चला आ रहा था। गाँव के साथ उठता-बैठता शहर भी। शहर गाँव के दृश्य में खोया-खोया सा आता है। समय का पहिया पीछे की ओर चलने लगता है, हम पराधीन भारत में पहुंचने लगते हैं और किसान की दास्तान गोदान से चलते हुए स्वाधीन भारत में। कौन किस जगह है यह अब अदृश्य है, सत्य यह वास्तविकता ही है कि किसान चिरंतन शोषित हैं।


महानगर में बैठ प्रेमचंद को पढ़ते हुए मैं कितना ग्रामीण परिवेश को समझ सकता हूँ, सपनों के शहर में कितना यथार्थ को महसूस कर सकता हूँ, कितना मैं होरी हो सकता हूं..! गाय की आस लिए ही मरते हुए होरी के लिए गोदान की व्यवस्था करती धनिया की वेदना को हम कितना महसूस कर सकते हैं? वह शहर जहां सर्दी में विषैले धुन्ध-कोहरे को हटाने के लिए पानी के छींटे देने होते हैं वहाँ संवेदना पर बैठे धूल को कितना गोदान हटा सकता है ! उपरोक्त सारे ‘कितना’ आज भी दबे हुए हैं सूदखोरों के चंगुल में। अब भी सूद चुकाते जा रहा है किसान, मूल तो बकाया ही है !


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