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प्रदूषण : खबर में सिर्फ़ दिल्ली ही क्यों ?

By gautamjkr1995@gmail.com
December 23, 2020 3 Min Read
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By Malay Nirav 


“देश में एक ही PM ( प्रधानमंत्री ) होने चाहिए, इसलिए PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कण की हमें जरुरत नहीं है।“


आये दिन, खासकर सर्दी के मौसम में, दिल्ली का प्रदूषण किसी फिल्मी सुपरस्टार की तरह टीवी, सोशल-मीडिया,अखबारों की सुर्खियों में छाया रहता है। दिल्ली से बाहर वाले सुकून में होते हैं कि वो ‘ देश की राजधानी ‘ में नहीं रहते हैं। अगर यही परिस्थिति और एक-आध दशक तक बनी रही तो वह दिन दूर नहीं होगा जब “देश की राजधानी” प्रदूषण की वजह से होने वाले पलायन की राजधानी बनकर उभरेगी। लेकिन क्या प्रदूषण सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित है या सुर्खियों में सिर्फ़ दिल्ली ही रहती है? दिल्ली का प्रदूषण की वजह से खबर में बने रहना सौभाग्य है या दुर्भाग्य? क्या सिर्फ़ दिल्ली के प्रदूषण को दूर कर अन्य शहर-नगर को भी प्रदूषण मुक्त घोषित किया जा सकता है? या क्या सिर्फ़ दिल्लीवासी ही प्रदूषण से प्रभावित होते हैं और अन्य भारतीय फिल्टर युक्त नाक रखते हैं? (विशेष आग्रह, प्रदूषण जहां भी लिखा हो उसको वायु प्रदूषण पढ़ें।)


आईआईटी कानपुर, किसी परिचय का मोहताज नहीं है और कानपुर का परिचय नीचे के ग्राफ से आपको मिल जाएगा! हालांकि यह आँकड़ा थोड़ा पुराना है, लेकिन कहते हैं ना कि ओल्ड इज गोल्ड! नम्बर एक पर हैं हमारा कानपुर; ना-ना आईआईटी रैंकिंग में नहीं, वायु-प्रदूषण में! लेकिन आईआईटी कानपुर का एक भी रिपोर्ट कानपुर के वायु-प्रदूषण पर देखने को नहीं मिलता है, हालाँकि आप बहुतेरे रिपोर्ट दिल्ली के वायु-प्रदूषण पर देख सकते हैं! आखिर यह मेहरमानी दिल्ली पर ही क्यों? क्या यह आईआईटी कानपुर का दिल्ली वालों से एक तरफा प्रेम है या कानपुर वालों से एक तरफा नफ़रत!


Courtesy: Times of India

वायु-प्रदूषण एक वैश्विक-दानव है। इसकी गिरफ्त में लगभग सभी देश हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह अपराजेय है। कभी पॉल्यूशन कैपिटल कहलाने वाले बीजिंग ने इसको अपने यहाँ से खदेड़ दिया है। मल्टी-फंक्शन डस्ट सेप्रेशन ट्रक से पानी का छिड़काव सहित एंटी स्मॉग पुलिस जैसे अनेक उपाय के माध्यम से चीन इस दानव से निपट पाया। वहीं दूसरी तरफ़ पेरिस ऑड-ईवन तरीके से कारों पर नियंत्रण कर, तो जर्मनी सार्वजनिक परिवहन बेहतर करने पर जोर देकर वायु-प्रदूषण से निपट रहा है। ‘ मौत की घाटी ‘ कहे जाने वाले ब्राजील का एक शहर क्यूबाटाउ ने उद्योगों पर चिमनी फिल्टर्स लगाने का दबाव डाल कर खुद को इस शापित उपाधि से मुक्त किया। हमारे देश के पास इन सफल कहानियों से सीखने के लिए बहुत कुछ है। 

एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में भारत में लगभग 1.6 मिलियन लोगों की मौत वायु-प्रदूषण से होने वाली बीमारी की वजह से हुई। वहीं ग्रीनपीस की रिपोर्ट के अनुसार 2020 के शुरुआती छह महीने में लगभग 24 हजार लोगों की मौत प्रदूषण की वजह से हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत, साँस की बीमारियों और अस्थमा से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया में अग्रणी है। वहीं विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 14 भारतीय शहरों का होना भारत में प्रदूषण की समस्या के गंभीर स्तर को बताता है। इस भयाक्रांत स्थिति को केवल सामूहिक प्रयास से ही बदल सकते हैं। आम नागरिक, समाज, सरकार और संस्थाओं को एक जुट होकर एक ईमानदार कोशिश करनी चाहिए। प्रदूषण को सिर्फ़ दिल्ली-केंद्रित उपाय करके दूर नहीं किया जा सकता है। विकेंद्रीकृत तरीका अपनाकर हर शहर-नगर की प्राथमिकता को तय करना होगा। स्मॉग टॉवर, इलेक्ट्रिक वाहन, वृक्ष प्रत्यारोपण नीति, ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधन जैसे अनेक तरीकों को अपनाकर हम एक प्रदूषण मुक्त भारत बना सकते हैं। नीतियों और कानूनों का सही क्रियान्वयन प्रदूषण रुपी दानव को हटाने के लिए अनिवार्य है। एक ईमानदार राजनीति के साथ आम नागरिक की सहभागिता से ही हमारा आकाश और भविष्य दोनों निर्मल हो सकता है।

देश में एक ही PM ( प्रधानमंत्री ) होने चाहिए, इसलिए PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कण की हमें जरुरत नहीं है। भारत सरकार ने “राष्ट्रीय स्वच्छ वायु प्रोग्राम” ( NCAP ) को शुरू किया है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2024 तक 122 शहरों का PM2.5 और PM10 वर्ष 2017 की अपेक्षा 20-30% कम करना है। हाल ही में दिल्ली सरकार ने “इलेक्ट्रिक वाहन नीति, 2020” को अधिसूचित किया जो ईवीएस के साथ निजी चार पहिया वाहनों के बजाय दोपहिया वाहन, सार्वजनिक परिवहन, साझा वाहनों और माल-वाहक द्वारा प्रतिस्थापन पर सबसे अधिक ज़ोर देती है। ऐसे ही अनेक दूरदर्शी नीतियों को सही ढंग से लागू कर हम प्रदूषण को टा-टा बाय-बाय कर सकते हैं।

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