घो घो रानी कितना पानी? इतना पानी.. इतना पानी
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| प्रतीकात्मक तस्वीर |
By Malay Nirav
“घो घो रानी
कितना पानी” …”सुपली भर पानी”… “ठेवना भर
पानी”…”कमर भर पानी”। इस बाल गीत को कभी न कभी हम सब जरूर सुनें
होंगे, खेले होंगे
यह खेल अपने-अपने बचपन में। यहाँ ‘हम सब‘ लिखकर मैं अतिरेक
कर रहा हूँ, लेकिन अपने
बालमन की स्मृति में दर्ज इस गीत से घनघोर लगाव ही मुझसे गीत को सर्वविदित कहलवा
रहा है। मैं भी इस गीत से गुजरा हूँ। यथार्थ में तो नहीं लेकिन इस खेल में कमर भर
पानी में डूबा हूँ।
आज अचानक क्यों यह गीत मुझमें उमड़-घुमड़ रहा है? न ही अब मेरा मन
बाल है और न ही अब वे साथी साथ हैं जो यह पूछा करते थे। किरदार बदल गए हैं, अब यह “घो घो
रानी कितना पानी” सवाल प्रकृति हमसे पूछ रही है, इन्दर देव पूछ रहे
हैं। पूछ रहे हैं, और बिन
जवाब सुने बरसा दे रहे हैं,
अलमस्त बारिश…मदमस्त..!
सावन का माह अभी-अभी गुजरा है। सावन की बारिश ठहर गई है
हमारे पास। पटना डूबा, गया डूबा, सहरसा डूबा, भागलपुर-भोजपुर
डूबा, प्रयागराज
भी। अच्छा हुआ कि इलाहाबाद बच गया नहीं तो निराला को लिखना पर जाता “वह डूबता
पत्थर”..! गंगा, गंडक, बागमती उफान पर है, कोसी कहाँ पीछे
रहना जाने है, वह भी बहे
जा रही है, बहाए जा
रही है…घर-दुआर-अंगना, खेत-खलिहान, सड़क, शहर, गाँव-देहात… कहीं
आँगन स्वीमिंग पुल बना हुआ है तो कहीं सड़क नदी।
पानी अपना रास्ता भूल गया है या कि हम रोक रहे हैं उसका
रास्ता, हम दोनों
ही अंतर्द्वंद में हैं। कौन इसका फैसला करेगा? पानी को कभी ‘प्रकृति का
कहर‘ कह पुकारते हैं तो
कभी ‘प्रकृति की
मेहरबानी‘ कह। आखिर
ऐसा क्यों हो रहा है? तैरने के
लिए नाव बनता है तो डूबने के लिए घर! सड़क पर नदी, नदी में नाव,
फिर किधर चले टमटम, रिक्शा, टेंपो। सवारी को
क्या जो बहता दिखे उसके सवार हो लिए,
लेकिन इनका क्या जो बिन सवारी ही बहे जा रहे हैं?
बारिश का आना अब कैलेंडर के हिसाब से तय नहीं हो रहा है। नए
कैलेंडर की जरूरत है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी अतीत की बातें हो गई हैं। पहाड़ हो
या फिर मैदान हर जगह बारिश अपना स्वरूप बदल रही है। जितना बरसात महीना भर में होता
था अब एक दिन में हो जा रहा है। राजधानी चाहे प्रदेश की हो या देश की बारिश के
अलबेलेपन को झेल रही है। सड़कों का,
सरकारी जमीनों का, पड़ोसी के
मेड़ों का अतिक्रमण करते-करते अब हम नदियों का अतिक्रमण करना शुरू कर दिए हैं।
अतिक्रमण का फैलता साम्राज्य नदियों को सिकोड़ता है। सिकुड़ती हुई नदी अक़्सर बाढ़
लाती है। जैसे ही बारिश सामान्य से अधिक होती है नदियों के किनारे बसे घर डूबने
लगते हैं। शहर तो सड़कों, नालियों का
प्रयोगस्थली बन गए हैं। नाली के ऊपर सड़क,
सड़क के ऊपर नाली, नाली..सड़क…नाली, कौन बनेगा, कौन टूटेगा पता
नहीं होता है, किसका
निर्माण चल रहा यह भी देखने-चलने वालों को पता नहीं होता है, जब बारिश होती है
तो बरसात को भी दुविधा होती है नाले और सड़क को अलग-अलग समझने में। इसलिए बारिश का
पानी कभी नाली में तो कभी सड़क पर ही बहने लगता है।
प्रकृति जितना देती है उतना हमें आज तक समेटना नहीं आया है।
कभी हम कम के प्रकोप में आ जाते हैं तो कभी ज्यादा की भीषणता में। अगर हम समेटना, सहेजना सीखे होते
तो कम बारिश हो या ज्यादा खुशी-खुशी स्वीकार कर रहे होते।
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| प्रतीकात्मक तस्वीर |
खबर में देखिए तो पता चलेगा बिहार बारिश, बाढ़ के प्रकोप में
हैं। चारों तरफ पानी ही पानी। जलमग्न की स्थिति। ख़बरें भी जल में तैरकर ही हम तक
पहुंच रही हैं। छनकर भी। बिहार के कई क्षेत्र हैं जहां सड़कों पर पानी नहीं, टैंकरों में पानी
दौड़ रहा है। जलमग्न नहीं धरातल…जलस्तर निरंतर नीचे जा रहा है। चापाकल से पानी
का निकलना कम से कमतर होते-होते रुक ही जा रहा है। पड़ोसी के चापाकल पर निर्भरता
बढ़ रही है। लेकिन धीरे-धीरे सब एकमेव हो रहे हैं। चापाकल का सूखना एक घर से शुरू
होकर गाँव तक फैल गया है, एक गांव से
बढ़कर अनेक। धीरे-धीरे लोगों की निर्भरता पड़ोसी से खत्म हो सरकार और टैंकरों पर
स्थानान्तरित हो गयी है। मधुबनी का कुछ क्षेत्र, नेपाल के करीब कई ग्रामीण, शहरी इलाकों में लोग अब तक सावन और चापाकल में जल का इंतजार
कर रहे हैं। छोटे-छोटे पोखर,
तालाब सूखने लगे हैं। बिहार की यह विसंगति, यह विरोधाभास कि कहीं कठौती में गंगा तो कहीं सूखी कठौती, असामान्य है। जल-धन
का यह असमान वितरण 21वीं सदी के
विकासशील, विकसित सभी
देशों का यथार्थ बन गया है।
सूखा,
बाढ़ सहोदर थे अब जुड़वां बनते जा रहे हैं। कोई भी अकेला नहीं आता है।
साथ-साथ। प्रदेश का एक क्षेत्र बाढ़ से आच्छादित है तो दूसरा क्षेत्र सूखा से। हो
सकता है कि बिहार का एक नागरिक अपने चापाकल में पानी का इंतजार करते हुए सोशल
मीडिया पर बिहार के दूसरे क्षेत्रों में आए बाढ़ के दृश्य को देख खुश हो रहा हो!
यह खुशी बाढ़ की नहीं जल-जल-जल…अथाह पानी की है।
दिन-तारीख बार-बार लौट आते हैं, साल नहीं। पिछले
साल जब मैं दरभंगा से मधुबनी की ओर जाता था,
लबालब भरे तालाब, उसमें
नहाते जानवर, कपड़े धोते
इंसान…इन सबको देख मन ही मन इठलाता था…कौन कहता है कि तीसरा विश्व युद्ध जल के
लिए होगा, आओ, देखो, कितने सुकून से हम
तालाब किनारे बैठे हैं। आसमान कितना तप रहा होता था, हम पेड़ के नीचे तालाब किनारे बैठे ठंडी हवा में डोलते
पत्ते और पानी को देखा करते थे। दिन वही,
तारीख वही, साल वो
नहीं। सूखते तालाब और उसके कीचड़ में साफ साफ दिखता जानवरों के पैर के निशान बतला
रहे थे मुझे कि यह वह साल नहीं है. अब कोई कपड़ा धोते तालाब किनारे नहीं दिखता है।
मिट्टी का रंग बदल गया है, हरे पेड़
मुरझाए-से दिखने लगे, खेतों में
खालीपन भर आया है। तालाब का यह सूनापन और अकेलापन खलता है। खलता है एक तरफ का बाढ़, दूसरे तरफ का सूखा।
कभी-कभी लगता है कि पलायन भी ऐश्वर्य और सामर्थ्य खोजता है। पानी है कि आपके गली
में घुस आये कि पानी धरती में छुप जाए,
लेकिन हम सब अपनी झोपड़ी में ही इस उम्मीद से इंतजार करते रहते हैं कि वो साल
लौट आएगा!
कल बाढ़ था,
आज सूखा है, वहाँ सूखा
था, यहां बाढ़ है। बाढ़
और सूखा, कल और आज, वहाँ और यहाँ..इन
सबके बीच क्या है…सूखा है फिर अचानक बाढ़ तो नहीं होता है, तो सूखा से बाढ़ तक
आने के बीच का हिस्सा क्या होता है…यह ‘बीच का
हिस्सा‘ हम देख-समझ
क्यों नहीं पाते है? यह पानी का
बरकत से पानी का किल्लत यूँ ही तो नहीं होता है। इन सबके बीच हमारा अपना सच होता
है, जिसे हम हमेशा छोड़
देते हैं। जब तक हम सब अपने हिस्से के सच को छोड़ते रहेंगे, बाढ़ और सूखा होता
रहेगा। जिस दिन हम अपने-अपने सच को कबूल लेंगे, एक पुल बन जाएगा बाढ़ और सूखा के बीच, जहां दोनों ही
घुलमिल कर जीवन हो जाएंगे!
