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कृषि कानूनों को सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता है खारिज

By gautamjkr1995@gmail.com
January 1, 2021 4 Min Read
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By Sachin Baghel

किसानों के प्रदर्शन को एक माह से ज्यादा हो गया है। वो खुले आसमान के नीचे ,ठंड़े पथरीले हाइवे के ऊपर अपना ढेरा डाले हुए हैं। दिल्ली में शीतलहर का प्रकोप कहर ढा रहा है और सरकार की टालमटोली का अंत निकट नजर नहीं आ रहा है । ठंड अबतक 40 से अधिक किसानों को अपने आगोश में ले चुकी है। ऐसे में किसानों की उम्मीद का एक ही ठिकाना है सुप्रीम कोर्ट। क्या कोर्ट किसानों को राहत दे सकता है ? क्या कोर्ट इन कृषि कानूनों को असंवैधानिक बता कर रद्द कर सकता है? आइए इसपर विचार करते हैं- 

Courtesy: Scroll.in


संवैधानिकता का प्रश्न

असंवैधानिकता का आशय है कि जो संविधान सम्मत न हो। किसी कानून की संवैधानिकता दो आधारों पर परखी जाती है। पहला है उसकी विषयवस्तु ,कहीं कानून की विषयवस्तु संविधान के किसी प्रावधान उल्लंघन तो नहीं कर रही है? दूसरा है, संसद से कानून के पारित होने की प्रक्रिया। क्या कोई कानून संविधान में बनाए गए नियमों के विरुद्ध जाकर तो पारित नहीं हुआ है? 

विषयवस्तु के आधार पर  

सबसे पहले देखते हैं विषयवस्तु के आधार पर कोई कानून कब खारिज होता है। इसपर सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय बहुत स्पष्ट है।

 प्रथम- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कोई कानून जब मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहा हो तो वह असंवैधानिक है। यह बात संविधान के अनुच्छेद 13  में भी लिखी है । जहां तक इन तीनों कानूनों को देखें तो कहीं से भी कोई अनुच्छेद 13 का प्रत्यक्ष उल्लंघन करता हुआ प्रतीत नहीं होता है। न ही किसानों के तरफ से अब तक किसी वकील ने भी इस आधार पर चुनौती देने की बात नहीं कही है।

दूसरा- ये कानून संविधान की आधारभूत संरचना यानी मूल ढांचे को तो चुनौती नहीं दे रहे हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में केशवानंद भारती के केस में व्याख्यायित किया था कि अगर कोई कानून मूल ढांचे में बदलाव कर रहा है तो वह कानून असंवैधानिक है। 

इस मामले में भी एक कोण से, जिसे संघवाद कहते हैं, के जरिए चुनौती देने की बात की जा रही है। संघवाद का सीधा अर्थ है केंद्र और राज्य की अधिकार सीमा । कोई किसी के क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकता। यहाँ कहा जा रहा है कि सातवीं अनुसूची में दिए गए विषय में कृषि तो राज्य सूची का मसला है। केंद्र इस पर कानून नहीं बना सकता है। इस आधार पर ये कानून असंवैधानिक हैं।  

हालांकि ये सही है कि कृषि राज्य सूची में 14वीं  प्रविष्टि है। लेकिन ये समवर्ती सूची में भी 33वीं प्रविष्टि है। समवर्ती सूची का अर्थ है कि इस विषय पर राज्य एवं केंद्र दोनों कानून बना सकते हैं। केंद्र इसी 33वीं प्रविष्टि के आधार पर नए कृषि कानून बनाए हैं और अनुच्छेद 254 में यह स्पष्ट है कि जब ऐसे किसी कानून को लेकर राज्य विधायिका और संसद में टकराव होंगे , हमेशा संसद के कानून को मान्य किया जाएगा। ऐसी ही स्थिति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय सर्वोच्चता का सिद्धांत दिया है। 

प्रक्रिया के आधार पर 


Courtesy: PTI

अब आते है दूसरे आधार प्रक्रिया पर। लोग बोल रहे हैं की जिस तरीके से ये कानून राज्यसभा से पारित हुए हैं वो असंवैधानिक है क्योंकि एनडीए के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था। इसलिए वोटिंग की जगह ध्वनिमत का इस्तेमाल कर जबरदस्ती पारित करा लिए गए।

 

ध्वनिमत पर सभापति का तर्क है कि वोटिंग के लिए सभी सांसदों का अपनी नियत जगह बैठना अनिवार्य होता है। लेकिन कोरोना के कारण दूरी बनाने के चलते कई सांसद अपने नियत स्थान पर नहीं बैठ सकते थे। इसलिए ध्वनिमत का उपयोग करना आवश्यक हो गया था। सदन में सभापति का निर्णय ही अंतिम माना जाता है। 

विपक्ष का आरोप है कि एनडीए के पास बहुमत नहीं था इसलिए ध्वनिमत के बहाने गैरकानूनी तरीके से पास करवाया गया। तो क्या बहुमत के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट कानूनों को खारिज कर देगा? 

जवाब है सम्भवतः नहीं, क्योंकि अनुच्छेद 122 स्पष्ट कहता है कि सदन के भीतर की कार्यवाही पर सवाल उठाना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। संसद इस मामले में सम्प्रभु है। वैसे भी कोर्ट कई बार ये कह चुका है कि संसद द्वारा पारित कानून को हम सदैव संविधान सम्मत मानकर चलते है। चुनौती देने वाले को इसे असंवैधानिक साबित करना होगा ।

बात बहुमत की है तो वैसे भी एनडीए जरूरी संख्या जुटा लेती, बगैर अपने सहयोगी शिवसेना और अकाली दल के । क्योंकि बीजू जनता दल ने एनडीए को समर्थन देने का भरोसा दिया था। एनसीपी और शिवसेना ने सदन से वॉकआउट कर दिया था। हम इंटरनेट पर उपलब्ध उस दिन की राज्यसभा की उपस्थिति देखकर समझ सकते हैं कि एनडीए के पास ज्यादा संख्या बल था। 

संयुक्त बैठक का प्रावधान  

खैर मान लेते हैं कि एनडीए बहुमत हासिल नहीं कर पाती । उससे कुछ नहीं होने वाला था। लोकसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति सरकार के कहने पर दोनों सदनों के संयुक्त बैठक बुलाने का राष्ट्रपति से अनुरोध कर देते।  कुछ दिनों में राष्ट्रपति के आदेश पर आधिकारिक प्रक्रिया के बाद संयुक्त बैठक होती। अभी तक सिर्फ 3 बार ही संयुक्त बैठक हुई है । जिसमें दोनों सदनों के सदस्य वोटिंग करते हैं और साधारण बहुमत से फैसला होता है। अभी लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 242 जोड़कर 785 सदस्य होते। अर्थात बिल पास कराने के लिए 393 चाहिए था एनडीए को। जबकि शिवसेना और अकाली दल को हटाने के बाद एनडीए के सिर्फ लोकसभा में 330 से ज्यादा सदस्य हैं और राज्यसभा के 110 से अधिक और हैं। मतलब एनडीए बिल्कुल आराम से इन बिलों को पास करा लेती। उसे सम्भवतः डर था तो मानसून सेशन के खत्म होने का। इसलिए इतनी जल्दबाजी दिखाई वरना अध्यादेश निरस्त होजाते।

तो यही लगता है कि सुप्रीम कोर्ट भी इन कानूनों पर किसानों को राहत नहीं दे सकता है। किसानों को अब सरकार को झुकाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है।

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gautamjkr1995@gmail.com

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